Saturday, 1 August 2020

कितने सही हैं देश में कोरोना केस और मौतों के आंकड़े !

सरकारी आंकड़ों को देखने के बाद लगता है कि भारत ने कोरोना संक्रमण की रोकथाम अच्छे से की है क्योंकि यहां मौत का आंकड़ा काफी कम है लेकिन यह एक भ्रम है क्योंकि भारत में कोरोना से होने वाली सभी मौतों को रिकॉर्ड में शामिल ही नहीं किया जा रहा है । 
कुछ राज्यों में तो कोरोना से होने वाली मौतों को रिकॉर्ड ही नहीं किया जा रहा है वहीं कुछ राज्यों में कोरोना मौतों को दूसरी बीमारियों से होने वाली मौत के रूप में दर्ज किया जा रहा है । इन बीमारियों में क्रोनिक हाईपरटेंशन, डायबिटीज या कैंसर जैसी बीमारियां शामिल हैं। इस सबके चलते लोगों पर वायरस के संक्रमण का खतरा बना हुआ है । 
इसके अलावा बहुत सी ऐसी मौतें भी हुई हैं जिनमें कोरोना के लक्षण थे लेकिन मौत से पहले उनका टेस्ट नहीं किया गया या उनके टेस्ट शुरुआत में निगेटिव आए थे । इन मौतों को भी दर्ज नहीं किया जा रहा है । 

 चीन की वुहान यूनिवर्सिटी और अमेरिका की नॉर्थवेल कोविड-19 रिसर्च कंसोर्शियम के अध्य्यन बताते हैं कि बिना कोरोना लक्षण वाले लोगों के भी फेफड़े और गुर्दे खराब हो सकते हैं । 

लेकिन ये सब इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। आईसीएमआर कहती है कि संदिग्ध और दूसरी बीमारियों वाली मौतों को भी कोरोनो से हुई मौत के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। यह जरूरी है क्योंकि भारत जैसे देश में में टेस्ट की दर बहुत कम है। प्रति एक हजार व्यक्ति पर टेस्ट की दर 8.55 ही है। इसके अलावा यह भी ध्यान रखना होगा कि सभी टेस्ट (आरटी-पीसीआर, ट्रूनेट, सीबीएनएएटी और रैपिड एंटीजेन) निगेटिव रिपोर्ट दे सकते हैं। यहां तक कि सबसे सटीक माने जाने वाले आरटी-पीसीआईर टेस्ट के नतीजे भी 70 फीसदी ही सही साबित हुए हैं। 

ब्रिटेन के मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में 38 वर्षीयी एक व्यक्ति को कोरोना का इलाज नहीं मिला, जबकि वह राज्य की राजधानी भोपाल में था। जब तक उसे अस्पताल ले जाया जा सका, उसकी मौत हो गई। अंतिम संस्कार के कुछ दिन बाद परिवार को पता चला कि शहर प्रशासन ने इस मौत को कोरोना से हुई मौत के रूप में दर्ज ही नहीं किया। इस बारे में जब प्रशासन से पूछा गया तो मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव फैज अहमद किदवई का कहना था कि यह स्पष्ट नहीं है कि इस व्यक्ति की मौत कोरोना से हुई, इसीलिए इसे रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया ।  
यह कोई अकेला मामला नहीं है। दिल्ली, तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में भी ऐसा ही हो रहा है। इन सभी राज्यों पर कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े छिपाने के आरोप हैं। दरअसल जानबूझकर मौतों की संख्या कम दिखाने के पीछे राजनीतिक कारण हैं और मंशा है कि सभी राज्य अपने यहां कोरोना संक्रमण के विस्तार को नियंत्रित करता हुआ दिखाना चाहते हैं। 

☆→ इसके अलावा आप दिल्ली हाई कोर्ट, गुजरात हाई कोर्ट व देश के अन्य न्यायालयों के टिप्पणियों पर गौर करेेंगे तो आपको पता चलेगा कि सरकारें बहुत कुछ झोल झाल कर रही है । 
और तो और विपक्षी पार्टीयों ने सत्ताधारी पार्टी पर कई गम्भीर आरोप लगाए हैं :- 
 बीजेपी ने छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार, दिल्ली की केजरीवाल सरकार, पश्चिम बंगाल की ममता सरकार व अन्य विपक्षी सरकारों पर आकांडो के हेर फेर के लिए गम्भीर आरोप लगाए हैं । 
तो उधर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित पूरी कांग्रेस - उत्तराखंड की भाजपा सरकार, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार, केेंद्र की मोदी सरकार पर भी "आकांडो का खेल" खेलने का आरोप लगा रही है । 

★ दिल्ली में भी आंकड़ों की हेराफेरी सामने आई है। मई के पहले सप्ताह में कोरोना के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर सामने आया था कि दिल्ली सरकार आंकड़ें छिपा रही है। अब भी स्थिति ऐसी ही है क्योंकि कब्रिस्तानों और श्मशान से मिलने वाले आंकड़ों और दिल्ली सरकार के आंकड़ों में बड़ा फर्क है। दिल्ली की तीन नगर निगमों ने कुल मिलाकर 17 जुलाई तक 4.155 कोरोना मौतों को दर्ज किया है, लेकिन दिल्ली सरकार के आंकड़ों में 17 जुलाई तक देश की राजधानी में सिर्फ 3,571 मौतें ही हुई हैं। 
वाशिंग्टन पोस्ट के मुताबिक गुजरात के वडोदरा में भी जून के बाद से करीब 2000 नए केस सामने आए हैं। लेकिन वायरस से होने वाली मौतों की संख्या सिर्फ 57 से 60 के बीच ही है। इससे लगता है कि सरकार जानबूझकर आंकड़े छिपा रही है। 

कोरोनावायरस संक्रमण से प्रभावित कई देशों ने अनजाने में ही सही, मौतों की अंडर रिपोर्टिंग की है. मौतों के आंकड़ों की स्टडी के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाया कि कोरोनावायरस से संक्रमण के दौरान मार्च में अमेरिका में कम से कम और 40 हजार मौतें हुई थीं. इन मौतों में कोविड-19 के साथ दूसरी वजहों से हुई मौतें भी शामिल थीं. फाइनेंशियल टाइम्स' ने हाल में कोरोनावायरस संक्रमण के दौरान 14 देशों में हुई मौतों का विश्लेषण किया था. अखबार के मुताबिक कोरोना वायरस से हुई मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 60 फीसदी ज्यादा हो सकती हैं. हालांकि 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'फाइनेंशियल' टाइम्स की स्टडी में भारत को शामिल नहीं किया गया था. 

भारत की महत्वाकांक्षी 'मिलियन डेथ स्टडी' का नेतृत्व करने वाले टोरंटो यूनिवर्सिटी के प्रभात झा कहते हैं कि भारत में अभी भी 80 फीसदी मौतें घरों में होती हैं. इनमें मलेरिया और न्यूमोनिया जैसी संक्रामक बीमारी से होने वाली मौतें शामिल हैं. प्रसव के दौरान मौत, हार्ट अटैक और दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग तो अक्सर अस्पतालों से हो जाती है. काफी लोगों को कुछ वक्त तक इलाज मिल जाता है. फिर वे लौट जाते हैं और घरों में उनकी मौत हो जाती है.

इसलिए सिर्फ अस्पताल से हुई मौतों की गिनती से ही हम यह पता नहीं लगा सकते कि भारत में वास्तव में कोविड-19 से कितने लोगों की मौत हुई है. 

फ़ोटो : सरकारी आकांडो के अनुसार भारत मे अभी तक 35,000 से अधिक लोगो की जान कोरोना वायरस ले चुका है 


भारत का 2020 के वर्ल्ड प्रेस इंडेक्स में 142वां स्थान है जबकि 2019 में 140वां स्थान था । अतः मीडिया से भी कोई उमीद नहीं है । 

वीडियो लिंक :- 1. बिना लक्ष्मण वाले कोरोना मरीजों की भी मौत हो सकती है ? 

2. भोपाल के कोरोना पीड़ित परिवार का दर्द और आकांडो का खेल

इस ब्लॉग का सोत्र :- गूगल सर्च, उच्च न्यायालयों की टिप्पणियां, विपक्ष के आरोप, जवजीवन समाचार वेबसाइट, BBC, मेडिकल जर्नल ( ब्रिटेन ), न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट व अन्य पब्लिक इन्फॉर्मेशन !! 

धन्यवाद 

भारतेन्दु विमल दुबे ( Contact )


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