Friday, 14 August 2020

स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम महिलाओं का योगदान

मुसलमानों से देशभक्ति का प्रमाण माँगने वालो, पहले अपने देशभक्ति का प्रमाम दो -
मुस्लिम महिलाएं केवल बुरखे में ही कैद नहीं रहती है बल्कि समय आने पर "दुश्मनों" के दांत भी खट्टे कर देती है । 

1. अरुणा आसफ अली : हरियाणा के एक रूढि़वादी बंगाली परिवार से आने वाली अरुणा आसफ अली ने परिवार और स्‍त्रीत्‍व के तमाम बंधनों
को अस्‍वीकार करते हुए जंग-ए-आजादी को अपनी कर्मभूमि के रूप में स्‍वीकार किया। 1930 में नमक सत्‍याग्रह से उनके राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत हुई। अँग्रेज हुकूमत ने उन्‍हें एक साल के लिए जेल में कैद कर दिया। बाद में गाँधी-इर्विंग समझौते के बाद जब सत्‍याग्रह के कैदियों को रिहा किया जा रहा था, तब भी उन्‍हें रिहा नहीं किया गया।

ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 अगस्‍त, 1942 को अरुणा आसफ अली ने गोवालिया टैंक मैदान में राष्‍ट्रीय झंडा फहराकर आंदोलन की अगुवाई की। वह एक प्रबल राष्‍ट्रवादी और आंदोलनकर्मी थीं। उन्‍होंने लंबे समय तक भूमिगत रहकर काम किया ।
सरकार ने उनकी सारी संपत्ति जब्‍त कर ली और उन्‍हें पकड़ने वाले के लिए 5000 रु. का ईनाम भी रखा । उन्‍होंने भारतीय राष्‍ट्रीय काँग्रेस की मासिक पत्रिका ‘इंकलाब ’ का भी संपादन किया । 1998 में उन्‍हें भारत रत्‍न से सम्‍मानित किया गया । 

2. बेगम हजरत महल 1857 के विद्रोह के सबसे प्रतिष्ठित चेहरों में से एक हैं। बेगम हजरत महल की हिम्मत का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने मटियाबुर्ज में जंगे-आज़ादी के दौरान नजरबंद किए गए वाजिद अली शाह को छुड़ाने के लिए लार्ड कैनिंग के सुरक्षा दस्ते में भी सेंध लगा दी थी। उन्होंने लखनऊ पर कब्ज़ा किया और अपने बेटे को अवध का राजा घोषित किया। इतिहासकार ताराचंद लिखते हैं कि बेगम खुद हाथी पर चढ़ कर लड़ाई के मैदान में फ़ौज का हौसला बढ़ाती थीं ।
_______________________________________ इसके अलावा असंख्य महिला नेताओं व स्थानीय महिलाओं ने भारत छोड़ो आंदोलन में अपनी भागीदारी दी जिसकी वजह यह आंदोलन सभी पूर्ववर्ती आंदोलनों से व्यापक तथा प्रभावशाली साबित हुआ। इसने द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेजों को भारत छोड़ने में भूमिका तैयार की .
☆ जब हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तब हमारा ध्यान तुरंत रानी लक्ष्मीबाई और बेग़म हज़रत महल की ओर जाता है. लेकिन क्या, इस संघर्ष में सिर्फ़ इन्हीं दो स्त्रियों का योगदान था? इस संघर्ष में दलित समुदायों से आने वाली औरतें थीं (विद्वान जिन्हें दलित वीरांगनाएं कहकर पुकारते हैं), कई भटियारिनें या सराय वालियां थीं, जिनके सरायों में विद्रोही योजनाएं बनाते थे. कई कलावंत और तवायफ़ें भी इसमें मददगार थीं, जो समाचार और सूचनाएं पहुंचाने का काम करती थीं. कइयों ने तो पैसों से भी इसमें मदद की. 

नोट :- हमारा उद्देश्य किसी के भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है । 
विभिन्न किताबों में और भी महिला स्वतंत्रता सेनानियों के नाम तर्ज है, उन्हें भी पढ़े । 


धन्यवाद 
                       

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