Friday, 28 August 2020

मोदी सरकार देश के लिए हानिकारक है :- भारत में बढ़ा भुखमरी और प्रेस की स्वतंत्रता हुई खत्म !! विश्व भुखमरी सूचकांक और विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में हुआ खुलासा ।।

मोदी सरकार के बाद भारत मे बेरोजगारी, भुखमरी, रेप, महिलाओं व अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा में जबरदस्त वृद्धि हुई है । 
ठहरिए, यह राहुल गांधी या किसी विपक्षी पार्टी का बेबुनियाद आरोप नहीं है बल्कि हकीकत है हकीकत ।  2014 के बाद भुखमरी इंडेक्स, मीडिया इंडेक्स, बेरोजगारी इंडेक्स आदि सभी मे भारत लगातार पिछड़ता जा रहा है ।

यहाँ हम वर्ल्ड हंगर इंडेक्स और वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के माध्यम से जानने की कोशिश करेंगे कि कैसे मोदी सरकार मीडिया पर कंट्रोल करके अपने नाकामियों को छिपा रही है । 

           ☆     भारत में बढ़ गया है भुखमरी      ☆

 2014 के बाद से ग्लोबल हंगर इंडेक्स ( विश्व भुखमरी सूचकांक ) में भारत की रैंकिंग में लगातार गिरावट आई है :-  

वर्ष 2014 में भारत जहां 55वें पायदान पर था, तो वहीं 2015 में 80वें, 2016 में 97वें और 2017 में 100वें पायदान पर आ गया. वर्ष 2018 की रैंकिंग में भारत पिछले वर्ष की तुलना में तीन पायदान और गिरकर 103वें स्थान पर आ गया है ।  

ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2019 में कुल 117 देशों को शामिल किया गया, जिसमें भारत 102वें पायदान पर है । यह दक्षिण एशियाई देशों में सबसे निचला स्थान है। भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2019 में पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से भी पीछे है । 

डेटा - Global Hunger Index

ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2018 में कुल 119 देशों को शामिल किया गया था जिसमें भारत 103वें पायदान पर था. भारत नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से पीछे था, लेकिन पाकिस्तान से आगे था. पाकिस्तान इस रिपोर्ट में 106वें स्थान पर मौजूद था जबकि भारत पिछले वर्ष 100वें स्थान पर था । 

15 अक्टूबर 2020 के आसपास ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) रिपोर्ट-2020 भी जारी हो गया है जिसे मैं आज 23 अक्टूबर को इस ब्लॉग में जोड़ रहा हूँ जिसके अनुसार भारत में अब भी काफी भुखमरी मौजूद है । 107 देशों के लिए की गई रैंकिंग में भारत 94वें पायदान पर आया है । भारत कई सारे पड़ोसी देशों यथा नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका, म्यामांर से भी पीछे चल रहा है । केवल 13 देश ऐसे हैं जो हंगर इंडेक्स में भारत से पीछे है । रिपोर्ट के मुताबिक भारत की करीब 14% जनसंख्या कुपोषण का शिकार है. भारत में बच्चों में कुपोषण की स्थिति भयावह है । 

           ☆  भारत मे प्रेस की स्वतंत्रता ? 

मीडिया का काम पैसे ले करके सरकारी विज्ञापन करना नहीं है क्योकि उसके लिए सरकार के पास भारी - भरकम बजट वाला "सूचना प्रसारण मंत्रालय" और "प्रसार भारती" है 
लेकिन 2014 के बाद मीडिया यही काम कर रहा है । 

न्यूज़ चैनलों पर से खेती - किसानी, ग्राउंड रिपोर्ट, बेरोजगारी आदि की खबरे पूरी तरीके से गायब हो गयी है । 
अब न्यूज़ चैनलों पर केवल प्रायोजित डिबेट होता है । 

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक ( वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स ) में भारत साल 2017 में 136वें स्थान पर और साल 2018 में 138वें स्थान पर था और साल 2019 में दो अंक कम होकर 140 पर पहुंच गया था. इस सर्वेक्षण में कुल 180 देशों को शामिल किया गया था. 

 2020 में भारत 142वे स्थान पर आया है जो आजतक का सबसे खराब प्रदर्शन है । 

👉 कश्मीर की स्थिति ने इस साल की रिपोर्ट को बहुत हद तक प्रभावित किया है. जम्मू-कश्मीर से 5 अगस्त 2019 को आर्टिकिल 370 हटाए जाने के बाद वहां की स्थिति तनावपूर्ण बानी हुई है.

जम्मू-कश्मीर में अपनी कार्रवाई से पहले, सरकार ने राज्य में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की, इंटरनेट और फोन बंद कर दिए और मनमाने ढंग से हजारों कश्मीरियों को हिरासत में ले लिया, जिनमें राजनीतिक नेता, कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील और बच्चों सहित संभावित प्रदर्शनकारी शामिल थे. 

👉 अगर केवल न्यूज़ चैनलों TV की बात की जाए तो भारत को 142वां स्थान भी नसीब ना हो क्योकि भारत के 80% इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अम्बानी का पैसा लगा हुआ है जो कि सत्ताधारी दल भाजपा के समर्थक के रूप में देखे जाते हैं । 

👉 इस सूची में लगातार चौथी बार नॉर्वे पहले स्थान पर है और नॉर्थ कोरिया सबसे निचले स्थान पर है । 2007 से 2012 तक नॉर्वे लगातार टॉप पर रहा था । अब तक जारी हुई कुल 18 रैंकिंग में से 13 बार नॉर्वे ही नंबर एक रहा है।

👉 दक्षिण एशिया में सामान्य तौर पर सूचकांक में खराब प्रदर्शन नजर आया. इसमें पाकिस्तान तीन स्थान गिरकर 145 और बांग्लादेश एक स्थान गिरकर 151 पर आ गया है. चीन 177वें स्थान पर उत्तर कोरिया से महज तीन स्थान ऊपर है. अर्थात 180वें स्थान पर उत्तर कोरिया है. 

 आने वाले समय में भी भारत में प्रेस पर अघोषित प्रतिबंध जारी ही रहेगा :- 

👉 मोदी सरकार की आलोचना करने वाली अनेकों वेबसाइटों को बिना किसी कारण के बंद किया जा चुका है । 

👉 हाल ही में Wall Street Journal ने अपने लेख में खुलासा किया है कि फेसबुक अपने प्लेटफार्म पर भाजपा से जुड़े लोगों को अधिक views, like व शेयर मुहैया करवाता है और यहाँ तक कि BJP से जुड़े लोगों के सांप्रदायिक पोस्ट को हटाता भी नहीं है ।  दिल्ली विधानसभा के सद्भावना कमेटी जिसके अध्यक्ष राघव चड्ढा है ने भी इस मामले में फेसबुक को दोषी माना है । 

RTI कार्यकर्ता साकेत गोखले, राहुल गांधी आदि ने भी इस सम्बंध में फेसबुक व भाजपा की आलोचना की है । 

गौरतलब हो कि जम्मू कश्मीर में अभी भी अनेकों तरह के प्रतिबंध जारी है । 

Image - जनज्वार.कॉम  

उत्तर प्रदेश समेत भारत के अन्य हिस्सों में पत्रकारों ( फोटोग्राफर, सहायकों, कार्यकर्ताओं सहित ) को काम नहीं करने दिया जा रहा है । कुछ की संदिग्ध हालात में मौत भी हुई है । 

ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 जारी हो गया है -   

जिसके अनुसार भारत में अब भी काफी भुखमरी मौजूद है । 107 देशों के लिए की गई रैंकिंग में भारत 94वें पायदान पर आया है । भारत कई सारे पड़ोसी देशों यथा नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका, म्यामांर से भी पीछे चल रहा है । केवल 13 देश ऐसे हैं जो हंगर इंडेक्स में भारत से पीछे है । रिपोर्ट के मुताबिक भारत की करीब 14% जनसंख्या कुपोषण का शिकार है. भारत में बच्चों में कुपोषण की स्थिति भयावह है ।  ( 23 अक्टूबर 2020 ) 

इसे भी पढ़े - सुप्रीम कोर्ट भी केवल सरकार के पक्ष में लिखने वालों को ही राहत देता है  

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Credit - #BhartenduVimalDubey 




Saturday, 22 August 2020

तबलीगी जमात को बलि का बकरा बनाया गया - मुंबई हाइकोर्ट

तो मेरे एक और ब्लॉग पर कोर्ट ने मुहर लगा दी है ।

बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की औरंगाबाद बेंच ने दिल्ली के तबलीगी जमात (Tablighi Jamaat) मामले में देश और विदेश के जमातियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है । कोर्ट ने कहा कि इस मामले में तबलीगी जमात को 'बलि का बकरा' बनाया गया । कोर्ट ने साथ ही मीडिया को फटकार लगाया । 


Credit - नवभारतटाइम्स.कॉम 

औरंगाबाद कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा, *दिल्ली के मरकज में आए विदेशी लोगों के खिलाफ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बड़ा प्रॉपेगेंडा चलाया गया* ।
ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई, जिसमें भारत में फैले Covid-19 संक्रमण का जिम्मेदार इन विदेशी लोगों को ही बनाने की कोशिश की गई। तबलीगी जमात को बलि का बकरा बनाया गया।' 

हाई कोर्ट बेंच ने कहा, 'भारत में संक्रमण के ताजे आंकड़े दर्शाते हैं कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ऐसे ऐक्शन नहीं लिए जाने चाहिए थे। विदेशियों के खिलाफ जो ऐक्शन लिया गया, उस पर पश्चाचाताप करने और क्षतिपूर्ति के लिए पॉजिटिव कदम उठाए जाने की जरूरत है।' 

गौरतलब हो कि सरकार द्वारा इस फैसले को बड़ी बेंच या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिया जा सकता है ।



धन्यवाद 

Thursday, 20 August 2020

कोविड 19 : ये एंटीजन व PCR टेस्ट का क्या लफड़ा है ?

किसी को कोरोना हुआ है या नहीं पता लगाने के लिए मुख्यतः तीन प्रकार टेस्टिंग किए जाते हैं - 
pic - अमर उजाला 

आइए तीनो संक्षिप्त में तीनों के विषय मे जाने - 

1.  Rapid Antigen TEST :- यह लैब के बाहर किया जाने वाला टेस्ट है - इसका इस्तेमाल टेस्ट के नतीजे को तुरंत जानने के लिए किया जाता है । 
pic - Washington Post 

कोविड-19 SARS-CoV-2 वायरस से होता है ।
इस टेस्ट में SARS-CoV-2 वायरस में पाए जाने वाले एंटीजन का पता चलता है. टेस्ट के नतीजे में एंटीजन की मौजूदगी कोरोना के संभावित संक्रमण का लक्षण है
एंटीजन वो बाहरी पदार्थ है जो कि हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को एंटीबॉडी पैदा करने के लिए एक्टिवेट करता है. एंटीबॉडी बीमारियों से लड़ने में कारगर साबित होता है. एंटीजन वातावरण में मौजूद कोई भी तत्व हो सकता है, जैसे कि कैमिकल, बैक्टीरिया या फिर वायरस. एंटीजन नुकसानदेह है, शरीर में इसका पाया जाना ही इस बात का संकेत है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को एक बाहरी हमले से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने पर मजबूर होना पड़ा है. 
मतलब अगर आपके शरीर मे एंटीजेन है तो आप कोरोना पॉजिटिव है और अगर आपके शरीर मे एंटीजेन नहीं है तो आपको कोरोना नहीं है । 

2. एंटी बॉडी टेस्ट :- यह एंटीजन व PCR दोनों से अलग है । 
एंटी बॉडी टेस्ट खून का सैंपल लेकर किया जाता है - इसलिए इसे सीरोलॉजिकल टेस्ट ( सिरो सर्वेे ) कहते हैं । 
pic - दैनिक भास्कर 

इस टेस्ट में संक्रमण के बाद एंटीबॉडी बनने का लक्षण पता चलता है. एंटीबॉडी शरीर का वो तत्व है, जिसका निर्माण हमारा इम्यून सिस्टम शरीर में वायरस को बेअसर करने के लिए पैदा करता है. संक्रमण के बाद एंटीबॉडीज बनने में कई बार एक हफ्ते तक का वक्त लग सकता है, इसलिए अगर इससे पहले एंटीबॉडी टेस्ट किए जाएं तो सही जानकारी नहीं मिल पाती है. इसके अलावा इस टेस्ट से कोरोना वायरस की मौजूदगी की सीधी जानकारी भी नहीं मिल पाती है. इसलिए अगर मरीज का एंटी बॉडी टेस्ट निगेटिव आता है तो भी मरीज का RT-PCR टेस्ट करवाया जाता है. 

3. RT - PCR टेस्ट :- इस टेस्ट को कोरोना की पहचान के लिए WHO व ICMR ने गोल्ड स्टैंडर्ड फ्रंटलाइन टेस्ट कहा है मतलब इसको सबसे बढ़िया वाला टेस्ट माना जाता है ।
ये टेस्ट लैब में ही किया जाता है .
pic - NDTV 

इस टेस्ट में निगेटिव रिजल्ट तभी आता है जबकि मरीज के शरीर में वायरस मौजूद नहीं रहते हैं. 

निष्कर्ष :- 
1. एंटीबॉडी टेस्ट ( खून वाला ) केवल सर्वे करने के लिए किया जाता है कि पर्टिकुलर एरिया में कितनो लोगो को कोरोना हो चुका है । 
जैसे कि दिल्ली व महाराष्ट्र सरकार ने सिरो सर्वे करवाया था । 
2. मोटे तौर पर समझे तो एंटीजन टेस्ट में पॉजिटिव आया व्यक्ति नेगेटिव नही हो सकता है
 किंतु नेगेटिव आया व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव हो सकता है * इसलिए अगर मरीज का एंटीजन टेस्ट निगेटिव आता है तो भी मरीज का RT-PCR टेस्ट करवाया जाता है* । 

3. RT - PCR टेस्ट में पॉजिटिव आया व्यक्ति पॉजिटिव ही होता है और नेगेटिव आया व्यक्ति नेगेटिव ही होता है । 💯
समझे

★ एंटीजेन व PCR दोनों टेस्ट में संभावित मरीज के नाक के छेद या गले से स्वाब लिया जाता है । 
तीनो प्रकार के टेस्ट में कोविड -19 पॉजिटिव बताया गया व्यक्ति वास्तव में पॉजिटिव ही होता है ।

Note :- RT-PCR कोरोना टेस्टिंग की महंगी प्रणाली है. इसमें सैंपल से RNA निकालने वाली मशीन की जरूरत पड़ती है. इसके लिए एक प्रयोगशाला और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की भी जरूरत पड़ती है. इस टेस्ट को करने में लैब में ही 4 से 5 घंटे का समय लगता है. इसकी लागत भारत में 4500 रुपये के करीब आती है. इसीलिए उत्तर प्रदेश सहित तमाम राज्य सरकारों के द्वारा एंटीजन टेस्ट पर अधिक जोर दिया जा रहा है । 

इस ब्लॉग में मौजद जानकारियों का सोत्र :- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), PGI लखनऊ, BBC व NDTV 

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धन्यवाद 

Friday, 14 August 2020

स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम महिलाओं का योगदान

मुसलमानों से देशभक्ति का प्रमाण माँगने वालो, पहले अपने देशभक्ति का प्रमाम दो -
मुस्लिम महिलाएं केवल बुरखे में ही कैद नहीं रहती है बल्कि समय आने पर "दुश्मनों" के दांत भी खट्टे कर देती है । 

1. अरुणा आसफ अली : हरियाणा के एक रूढि़वादी बंगाली परिवार से आने वाली अरुणा आसफ अली ने परिवार और स्‍त्रीत्‍व के तमाम बंधनों
को अस्‍वीकार करते हुए जंग-ए-आजादी को अपनी कर्मभूमि के रूप में स्‍वीकार किया। 1930 में नमक सत्‍याग्रह से उनके राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत हुई। अँग्रेज हुकूमत ने उन्‍हें एक साल के लिए जेल में कैद कर दिया। बाद में गाँधी-इर्विंग समझौते के बाद जब सत्‍याग्रह के कैदियों को रिहा किया जा रहा था, तब भी उन्‍हें रिहा नहीं किया गया।

ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 अगस्‍त, 1942 को अरुणा आसफ अली ने गोवालिया टैंक मैदान में राष्‍ट्रीय झंडा फहराकर आंदोलन की अगुवाई की। वह एक प्रबल राष्‍ट्रवादी और आंदोलनकर्मी थीं। उन्‍होंने लंबे समय तक भूमिगत रहकर काम किया ।
सरकार ने उनकी सारी संपत्ति जब्‍त कर ली और उन्‍हें पकड़ने वाले के लिए 5000 रु. का ईनाम भी रखा । उन्‍होंने भारतीय राष्‍ट्रीय काँग्रेस की मासिक पत्रिका ‘इंकलाब ’ का भी संपादन किया । 1998 में उन्‍हें भारत रत्‍न से सम्‍मानित किया गया । 

2. बेगम हजरत महल 1857 के विद्रोह के सबसे प्रतिष्ठित चेहरों में से एक हैं। बेगम हजरत महल की हिम्मत का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने मटियाबुर्ज में जंगे-आज़ादी के दौरान नजरबंद किए गए वाजिद अली शाह को छुड़ाने के लिए लार्ड कैनिंग के सुरक्षा दस्ते में भी सेंध लगा दी थी। उन्होंने लखनऊ पर कब्ज़ा किया और अपने बेटे को अवध का राजा घोषित किया। इतिहासकार ताराचंद लिखते हैं कि बेगम खुद हाथी पर चढ़ कर लड़ाई के मैदान में फ़ौज का हौसला बढ़ाती थीं ।
_______________________________________ इसके अलावा असंख्य महिला नेताओं व स्थानीय महिलाओं ने भारत छोड़ो आंदोलन में अपनी भागीदारी दी जिसकी वजह यह आंदोलन सभी पूर्ववर्ती आंदोलनों से व्यापक तथा प्रभावशाली साबित हुआ। इसने द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेजों को भारत छोड़ने में भूमिका तैयार की .
☆ जब हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तब हमारा ध्यान तुरंत रानी लक्ष्मीबाई और बेग़म हज़रत महल की ओर जाता है. लेकिन क्या, इस संघर्ष में सिर्फ़ इन्हीं दो स्त्रियों का योगदान था? इस संघर्ष में दलित समुदायों से आने वाली औरतें थीं (विद्वान जिन्हें दलित वीरांगनाएं कहकर पुकारते हैं), कई भटियारिनें या सराय वालियां थीं, जिनके सरायों में विद्रोही योजनाएं बनाते थे. कई कलावंत और तवायफ़ें भी इसमें मददगार थीं, जो समाचार और सूचनाएं पहुंचाने का काम करती थीं. कइयों ने तो पैसों से भी इसमें मदद की. 

नोट :- हमारा उद्देश्य किसी के भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है । 
विभिन्न किताबों में और भी महिला स्वतंत्रता सेनानियों के नाम तर्ज है, उन्हें भी पढ़े । 


धन्यवाद 
                       

हर बात में नेहरू - नेहरू करने वालो !! नेहरू का पूरा "खानदान" स्वतंत्रता का अग्रिम दूत था

    नेहरू परिवार का सन् 1927 का चित्र खड़े हुए (बायें से दायें) जवाहरलाल नेहरू, विजयलक्ष्मी पण्डित, कृष्णा हठीसिंह, इंदिरा गांधी और रंजीत पण्डित; बैठे हुए: स्वरूप रानी, मोतीलाल नेहरू और कमला नेहरू 

जो लोग अपने नाकामियों को छिपाने के लिए हर बात में नेहरू - नेहरू करते हैं
उन्हें मैं बता दूँ की "नेहरू" का पूरा "खानदान" यथा कमला नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडिता, मोतीलाल नेहरू, बृजलाल नेहरू, रामेश्वरी नेहरू, इंदिरा गांधी, कृष्णा नेहरू आदि स्वतंत्रता के अग्रिम दूत थे .

 नोट : पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादाजी गंगाधर मुस्लिम नहीं थे बल्कि मुस्लिम शाषक के अधीन आने वाले दिल्ली के आखिरी कोतवाल थे । 
पंडित गंगाधर नेहरू ने स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की थी । 


धन्यवाद 

Wednesday, 5 August 2020

कोरोना वायरस : आंकड़ो को समझने का अपना - अपना तरीका

मोदी सरकार लगातार कह रही है कि भारत अन्य देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में है, इसके पीछे सरकार का तर्क है कि भारत में कोरोना से मृत्युदर अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम है 
और सरकार की यह बात बिल्कुल सही है ।

वही विपक्ष कुछ रिपोर्ट्स के हवाला देते हुए कहा रही है कि सरकार मौत के आंकड़ो को छिपा रही है । 
पढ़िए रिपोर्ट : आंकड़ो का गोलमाल 

इधर WHO ने फिर से दोहराया है कि भारत अन्य कई देशों के तुलना में बहुत कम टेस्टिंग कर रहा है जिससे हमें वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल रहा है । 

गौरतलब हो कि भारत मे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया केवल सरकारी पक्ष को ही तवज्जों देती है जिसके कारण आम जनता को दोनों पक्षो में तुलना करने का अवसर ही नहीं मिलता है । 

देखिए :-

इधर सरकारें प्रेस कांफ्रेंस के नाम पर केवल "प्रेस रिलीज" जारी कर दे रही है जिसके कारण बचे कुचे पत्रकारों को भी सवाल करने का अवसर नहीं मिल पा रहा है । 

धन्यवाद 

Saturday, 1 August 2020

कितने सही हैं देश में कोरोना केस और मौतों के आंकड़े !

सरकारी आंकड़ों को देखने के बाद लगता है कि भारत ने कोरोना संक्रमण की रोकथाम अच्छे से की है क्योंकि यहां मौत का आंकड़ा काफी कम है लेकिन यह एक भ्रम है क्योंकि भारत में कोरोना से होने वाली सभी मौतों को रिकॉर्ड में शामिल ही नहीं किया जा रहा है । 
कुछ राज्यों में तो कोरोना से होने वाली मौतों को रिकॉर्ड ही नहीं किया जा रहा है वहीं कुछ राज्यों में कोरोना मौतों को दूसरी बीमारियों से होने वाली मौत के रूप में दर्ज किया जा रहा है । इन बीमारियों में क्रोनिक हाईपरटेंशन, डायबिटीज या कैंसर जैसी बीमारियां शामिल हैं। इस सबके चलते लोगों पर वायरस के संक्रमण का खतरा बना हुआ है । 
इसके अलावा बहुत सी ऐसी मौतें भी हुई हैं जिनमें कोरोना के लक्षण थे लेकिन मौत से पहले उनका टेस्ट नहीं किया गया या उनके टेस्ट शुरुआत में निगेटिव आए थे । इन मौतों को भी दर्ज नहीं किया जा रहा है । 

 चीन की वुहान यूनिवर्सिटी और अमेरिका की नॉर्थवेल कोविड-19 रिसर्च कंसोर्शियम के अध्य्यन बताते हैं कि बिना कोरोना लक्षण वाले लोगों के भी फेफड़े और गुर्दे खराब हो सकते हैं । 

लेकिन ये सब इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। आईसीएमआर कहती है कि संदिग्ध और दूसरी बीमारियों वाली मौतों को भी कोरोनो से हुई मौत के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। यह जरूरी है क्योंकि भारत जैसे देश में में टेस्ट की दर बहुत कम है। प्रति एक हजार व्यक्ति पर टेस्ट की दर 8.55 ही है। इसके अलावा यह भी ध्यान रखना होगा कि सभी टेस्ट (आरटी-पीसीआर, ट्रूनेट, सीबीएनएएटी और रैपिड एंटीजेन) निगेटिव रिपोर्ट दे सकते हैं। यहां तक कि सबसे सटीक माने जाने वाले आरटी-पीसीआईर टेस्ट के नतीजे भी 70 फीसदी ही सही साबित हुए हैं। 

ब्रिटेन के मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में 38 वर्षीयी एक व्यक्ति को कोरोना का इलाज नहीं मिला, जबकि वह राज्य की राजधानी भोपाल में था। जब तक उसे अस्पताल ले जाया जा सका, उसकी मौत हो गई। अंतिम संस्कार के कुछ दिन बाद परिवार को पता चला कि शहर प्रशासन ने इस मौत को कोरोना से हुई मौत के रूप में दर्ज ही नहीं किया। इस बारे में जब प्रशासन से पूछा गया तो मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव फैज अहमद किदवई का कहना था कि यह स्पष्ट नहीं है कि इस व्यक्ति की मौत कोरोना से हुई, इसीलिए इसे रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया ।  
यह कोई अकेला मामला नहीं है। दिल्ली, तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में भी ऐसा ही हो रहा है। इन सभी राज्यों पर कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े छिपाने के आरोप हैं। दरअसल जानबूझकर मौतों की संख्या कम दिखाने के पीछे राजनीतिक कारण हैं और मंशा है कि सभी राज्य अपने यहां कोरोना संक्रमण के विस्तार को नियंत्रित करता हुआ दिखाना चाहते हैं। 

☆→ इसके अलावा आप दिल्ली हाई कोर्ट, गुजरात हाई कोर्ट व देश के अन्य न्यायालयों के टिप्पणियों पर गौर करेेंगे तो आपको पता चलेगा कि सरकारें बहुत कुछ झोल झाल कर रही है । 
और तो और विपक्षी पार्टीयों ने सत्ताधारी पार्टी पर कई गम्भीर आरोप लगाए हैं :- 
 बीजेपी ने छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार, दिल्ली की केजरीवाल सरकार, पश्चिम बंगाल की ममता सरकार व अन्य विपक्षी सरकारों पर आकांडो के हेर फेर के लिए गम्भीर आरोप लगाए हैं । 
तो उधर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित पूरी कांग्रेस - उत्तराखंड की भाजपा सरकार, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार, केेंद्र की मोदी सरकार पर भी "आकांडो का खेल" खेलने का आरोप लगा रही है । 

★ दिल्ली में भी आंकड़ों की हेराफेरी सामने आई है। मई के पहले सप्ताह में कोरोना के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर सामने आया था कि दिल्ली सरकार आंकड़ें छिपा रही है। अब भी स्थिति ऐसी ही है क्योंकि कब्रिस्तानों और श्मशान से मिलने वाले आंकड़ों और दिल्ली सरकार के आंकड़ों में बड़ा फर्क है। दिल्ली की तीन नगर निगमों ने कुल मिलाकर 17 जुलाई तक 4.155 कोरोना मौतों को दर्ज किया है, लेकिन दिल्ली सरकार के आंकड़ों में 17 जुलाई तक देश की राजधानी में सिर्फ 3,571 मौतें ही हुई हैं। 
वाशिंग्टन पोस्ट के मुताबिक गुजरात के वडोदरा में भी जून के बाद से करीब 2000 नए केस सामने आए हैं। लेकिन वायरस से होने वाली मौतों की संख्या सिर्फ 57 से 60 के बीच ही है। इससे लगता है कि सरकार जानबूझकर आंकड़े छिपा रही है। 

कोरोनावायरस संक्रमण से प्रभावित कई देशों ने अनजाने में ही सही, मौतों की अंडर रिपोर्टिंग की है. मौतों के आंकड़ों की स्टडी के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाया कि कोरोनावायरस से संक्रमण के दौरान मार्च में अमेरिका में कम से कम और 40 हजार मौतें हुई थीं. इन मौतों में कोविड-19 के साथ दूसरी वजहों से हुई मौतें भी शामिल थीं. फाइनेंशियल टाइम्स' ने हाल में कोरोनावायरस संक्रमण के दौरान 14 देशों में हुई मौतों का विश्लेषण किया था. अखबार के मुताबिक कोरोना वायरस से हुई मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 60 फीसदी ज्यादा हो सकती हैं. हालांकि 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'फाइनेंशियल' टाइम्स की स्टडी में भारत को शामिल नहीं किया गया था. 

भारत की महत्वाकांक्षी 'मिलियन डेथ स्टडी' का नेतृत्व करने वाले टोरंटो यूनिवर्सिटी के प्रभात झा कहते हैं कि भारत में अभी भी 80 फीसदी मौतें घरों में होती हैं. इनमें मलेरिया और न्यूमोनिया जैसी संक्रामक बीमारी से होने वाली मौतें शामिल हैं. प्रसव के दौरान मौत, हार्ट अटैक और दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग तो अक्सर अस्पतालों से हो जाती है. काफी लोगों को कुछ वक्त तक इलाज मिल जाता है. फिर वे लौट जाते हैं और घरों में उनकी मौत हो जाती है.

इसलिए सिर्फ अस्पताल से हुई मौतों की गिनती से ही हम यह पता नहीं लगा सकते कि भारत में वास्तव में कोविड-19 से कितने लोगों की मौत हुई है. 

फ़ोटो : सरकारी आकांडो के अनुसार भारत मे अभी तक 35,000 से अधिक लोगो की जान कोरोना वायरस ले चुका है 


भारत का 2020 के वर्ल्ड प्रेस इंडेक्स में 142वां स्थान है जबकि 2019 में 140वां स्थान था । अतः मीडिया से भी कोई उमीद नहीं है । 

वीडियो लिंक :- 1. बिना लक्ष्मण वाले कोरोना मरीजों की भी मौत हो सकती है ? 

2. भोपाल के कोरोना पीड़ित परिवार का दर्द और आकांडो का खेल

इस ब्लॉग का सोत्र :- गूगल सर्च, उच्च न्यायालयों की टिप्पणियां, विपक्ष के आरोप, जवजीवन समाचार वेबसाइट, BBC, मेडिकल जर्नल ( ब्रिटेन ), न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट व अन्य पब्लिक इन्फॉर्मेशन !! 

धन्यवाद 

भारतेन्दु विमल दुबे ( Contact )


हिंदू ज्यादा मांस खाते हैं और उनमें नॉन-वेज फूड का क्रेज बढ़ता जा रहा है : रिपोर्ट

1. पूरी दुनिया में ऐसा माना जाता है कि हिंदू समुदाय के लोगों में मांसाहार का प्रचलन कम है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि हिंदू ज्यादा मांस खाते हैं और उनमें नॉन-वेज फूड का क्रेज बढ़ता जा रहा है। लोग मांसाहार को आधुनिकता और संपन्नता से जोड़ कर देखने लगे हैं। वहीं, काफी लोगों का यह मानना है कि मांसाहार स्वास्थ्य के लिए ज्यादा फायदेमंद है। पहले जहां हिंदुओं में बकरे का मांस और मछली खाने का प्रचलन ज्यादा था, अब ये देखा जा रहा है कि वे हर तरह के जानवरों का मांस खाने लगे हैं। 

 2. पिछले कुछ वर्षों के दौरान राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आंकड़ों से पता चला है कि देश में मांसाहार करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। साल 2011-12 के राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आंकड़ों से पता चला कि देश में करीब 8 करोड़ लोग, यानी औसतन हर 13 में से एक भारतीय बीफ भी खा रहा था। पता चला कि इन 8 करोड़ लोगों में से 7 प्रतिशत सवर्ण सहित करीब सवा करोड़ लोग हिंदू थे। इसके बाद हुए सर्वे से पता चला कि मांसाहारियों की संख्या में और भी ज्यादा वृद्धि हुई है और शाकाहारियों का अनुपात सिर्फ 23 से 27 प्रतिशत रह गया है। 

3. नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे में साल 1992-93 में हिंदू परिवारों में प्रजनन दर 3.3 थी जो साल 2015-16 में 2.1 हुई है जबकि बात अगर मुस्लिम परिवारों की हो तो 1992-93 में मुस्लिम परिवारों में प्रजनन दर 4.4 थी जो 2015-16 में घटते घटते 2.6 हो गई है. इस हिसाब से मुसलमानों की प्रजनन दर जहां 40 प्रतिशत तक कम हुई है वहीं हिंदू परिवारों में ये कमी 27 प्रतिशत तक कम दर्ज की गई है.  यानी कहा जा सकता है कि हिन्दू और मुस्लिम परिवार पिछले 22-23 सालों में प्रजनन दर को लेकर लगभग समानता की स्थिति में आ गए हैं. 

4. भारतीय गणतंत्र में हिन्दू धर्म के बाद इस्लाम दूसरा सर्वाधिक प्रचलित धर्म है,[5] जो देश की जनसंख्या का 14.2% है (2011 की जनगणना के अनुसार 17.2 करोड़)। 

5. भारत मे मुसलमानों की आबादी कुल जनसंख्या का मात्र 14 से 15 % है जबकि मांसाहारी भोजन करने वाली की संख्या 70% से अधिक है 
 जबकि कई सर्वे में अंडे को शाकाहारी में रखा जाता है । 

कॉपी राइट : हम सर्वे के डाटा का उपयोग कर सकते हैं । 

धन्यवाद 

केवल बकरीद के समय ही जीव प्रेम क्यो ? हिन्दू मंदिरों में भी जनवरो की बलि दी जाती है । भारत की 70% जनसंख्या मांसाहारी है ।

जानवर भी सजीव होते हैं, उन्हें भी जीने का हक है; 
मैं आपके इस तर्क से पूर्णतः सहमत हूँ 
लेकिन मुझे समझ नहीं आता है कि साल के 365 दिनों में आपका पशु प्रेम केवल बकरीद के दिन ही क्यो जागृत होता है ? 
क्या बाकी दिन मांसाहारी होटलों में ताला लगा होता है ?
या आप ये सब किसी प्रोपेगैंडा के तहत करते है ? क्योकि भारत के तमाम हिन्दू मंदिरों में भी जानवरों की बलि दी जाने की प्रथा है । 

आइए मैं आपको कुछ बेहद ही चौकाने वाले फैक्ट्स से रूबरू करवाता हूँ :- 
1. बेसलाइन सर्वे 2014 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 साल से अधिक उम्र की 71% आबादी मांसाहारी भोजन का सेवन करती हैl इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 71.6 फीसदी पुरुष और 70.7 फीसदी महिलाएं मांसाहारी हैं । 

बहरहाल, 
2. भारत के किसी भी शहर में किसी से भी अगर आप पूछते हैं कि आप वेज हैं या नॉन-वेज, तब कई ऐसे जवाब मिलेंगे जो हैरान करने वाले हो सकते हैं.

क्या ये चौंकाने वाला जवाब नहीं है, मनीला दुबे कहती हैं कि वो शाकाहारी हैं लेकिन सिर्फ़ चिकेन खाती हैं.

2003 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य संगठन ने एक सर्वे किया था जिसके मुताबिक भारत में 42 फीसदी लोग शाकाहारी हैं और इसके पीछे आर्थिक और धार्मिक कारण हैं. 

3. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपमेंट के डायरेक्टर संजय कुमार और इनके साथ योगेंद्र यादव ने 2006 और 2015 में ऐसा ही एक सर्वेक्षण कराया था जिसमें कई सारी बातें सामने आई थीं.

 कुछ ऐसे "पाखण्डी" लोग भी मिले जो प्याज़ लहसुन तो नहीं खाते लेकिन अंडा खा लेते हैं. 

आम धारणा है कि भारत एक शाकाहारी देश है लेकिन इस सर्वेक्षण से ये साफ़ निकल कर आता है कि भारत में मांसाहारी लोग 60 प्रतिशत हैं जबकि शाकाहारी 35 से 40 प्रतिशत हैं.  

क्या आपको पता है कि तमाम हिन्दू मंदिरों में भी जानवरों की बलि दी जाती है । 


नोट :- ऑप इंंडिया ( Op India ) एक एक "राइट विंगर" वेबसाइट है जो हिन्दू विचारधारा को फैलाने व भाजपा के सपोर्ट के लिए जाना जाता है ( आप इस वेबसाइट के विषय में विकिपीडिया पर भी पढ़ सकते हैं । 

देखिए ये वेबसाइट कैसे हिन्दू मंदिरों में बलि देने की प्रथा को रोकने के लिए त्रिपुरा हाइकोर्ट की टिप्पणी पर कैसे अपनी भड़ास निकाल रहा है । 

◇ गुवाहाटी के कामख्या मंदिर के विषय में पढ़ करके आप एकदम चौक जाएंगे । 

गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में आज भी बकरे और भैंसे की बलि दी जाती है . देश में ऐसे मंदिरों की संख्या बहुत है , जहां बलि देकर देवी-देवता को प्रसन्न करने की परंपरा है . 

जो लोग हर साल बकरीद के मौके पर जीव -हत्या का दर्शन बघारने आ जाते हैं , उन्हें मंदिरों में ये बंद कराना चाहिए ... 

नोट :- हमारा उद्देश्य किसी के भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है । हमारा कहना केवल इतना है कि जीव प्रेम के आड़ में किसी धर्म / समुदाय को निशाना बनाना उचित नहीं है । 

धन्यवाद 

भारतेन्दु विमल दुबे

देखिए कोरोना फैलने के लिए मीडिया ने मुस्लिम समाज को किस तरीके से जिम्मेदार ठहराया था 

क्या मीडिया ने सही किया था

राहुल के चमचो और मोदी के अंधभक्तो का सोशल मीडिया ज्ञान

जैसा की आपको पता है कि आजकल सोशल मीडिया पर कांग्रेस के कट्टर समर्थकों को "चमचा" और मोदी के कट्टर समर्थकों को "अंधभक्त" कहा जा रहा है 
और अक्सर ये लोग अपने पार्टी का समर्थन करने के लिए फर्जी खबरों व meme का सहारा लेते हैं । 

इस ब्लॉग में मैं आपको बताऊंगा की कैसे मैंने "अंध समर्थकों" के ही बातों में मामूली सा बदलाव करके उनको उन्ही के भाषा मे जबाब दिया :- 

1. मूल पोस्ट :- ट्रेन में बैठे व्यक्ति से पूछा- क्या आप दिल्ली से हो?बंदा भड़क के बोला:-हां हूँ मैं दिल्ली से,मैंने अकेले ने वोट थोड़े दिया उसको 😂 
इस पोस्ट के द्वारा एक भाजपा नेता "AAP" पर तंज कसा था । 

मेरा जबाब :- ट्रेन में बैठे व्यक्ति से पूछा - क्या आप वाराणसी से हो ? बंदा भड़क के बोला - हाँ हूँ मैं वाराणसी से, मैंने अकेले वोट थोड़े दिया उसको । 
मैं केवल शहर का नाम बदला और यह मोदी जी के "वाराणसी को लंदन बना दूंगा" वाले वादा पर तंज हो गया । 

2.  मूल पोस्ट :- Army से भी कठिन ट्रेनिंग होती है  चमचों की , 
Saले थुक चाट लेंगे मगर
प्रधानमंत्री के काम की  तारीफ नहीं करेगे 😂🤣

मेरा जबाब :- Army से भी कठिन ट्रेनिंग होती है अंधभक्तो की, 
Saले थूक करके चाट लेंगे मगर 
"बेरोजगारी" पर भी प्रधानमंत्री से सवाल नहीं करेंगे 😂🤣 

3. मूल पोस्ट :- पिता मोदी सरकार के किसान निधि से 6000/- निकालता है, माता जनधन से 500/- महीने का लेती है, 
दादा - दादी मोदी सरकार के कारण तीन महीने का एडवांस पेंशन लेते हैं, पूरा परिवार मुफ्त से गैस व राशन लेता है 
और भोजन करने के बाद बेटा फेसबुक पर लिखता है "मोदी चोर है" । 
इस पोस्ट के माध्यम से भाजपा समर्थक अपने सरकार की तारीफ करते हुए विपक्ष को गाली दे रहा है । 

मेरा जबाब :- पिता कांग्रेस सरकार के ट्यूबेल से खेत सींचता है, माता सम्पति में बराबर का हक पाती है, 
दादा - दादी कांग्रेस सरकार द्वारा बनवाए सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाते हैं व मुफ्त में दवाइयां भी लेते हैं, पूरा परिवार सरकारी नल से पानी पीता है और भोजन करने के बाद बेटा फेसबुक पर लिखता है "कांग्रेस ने 70 सालों में क्या किया ?" 
 { बाकी गैस सिलेंडर व फ्री राशन तो कांग्रेस सरकार भी देती थी ।
अब देखिए शब्दो मे थोड़ा परिवर्तन करके कैसे मैंने उनको उन्ही के भाषा मे जबाब दिया ... 

 निष्कर्ष : हमे आंख बंद करके किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करना चाहिए । 
किसी का समर्थन या विरोध करने के लिए फेक न्यूज़, एडिटेड वीडियो क्लिप, फोटोशॉप आदि का सहारा नही लेना चाहिए 
और सबसे बड़ी बात "सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं है" । 

इस विषय में और स्पष्टता के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करके वीडियो देखें 👇 

धन्यवाद