कहीं अश्वेत, कहीं श्वेत, कहीँ हिन्दू, कहीँ यहूदी, कहीं मुस्लिम, कहीं महिला, कही पुरूष, कही समलैंगिक, कही LGBTQ + , कही कोई और ... सब तो जुल्म सह रहे है ... इनको समानता कहाँ मिला हुआ है ?
देशों की सीमाएं अलग है, देशों की शासन व्यवस्था अलग है, देशों के "राजा" अलग है, देशों की संस्कृति आदि अलग है किंतु "कमजोर अलपसंख्यकों" के साथ भेदभाव एक जैसी ही है ।
देखिए मैं "कमजोर" या "शोषित वर्ग" से नहीं हूँ लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं अत्याचार के खिलाफ ना बोलूं ।
आज मैं "शोषित" नहीं हूँ लेकिन क्या पता "हम" से भी ताकतवर कोई आ जाए और "वो" हमारा शोषण करने लगे , ध्यान रहे उस परिस्थिति में आप के लिए भी कोई आवाज नहीं उठाएगा ।
मैं जब भी अपने videos या blogs में "शोषितों" की बात करता हूँ तो "कुछ लोग" कुतर्क करने आ जाते है . जैसे कि जब भारत के CAA / NRC के प्रदर्शनों के दौरान मैंने कहा कि "सरकार" को मुसलमानों से / प्रदर्शनकारियों से बात करना चाहिए तो लोगो ने मुझ से कहा कि आप "ब्राह्मण हिन्दू" हो, कश्मीरी पंडितों के समय आप कहाँ थे ?
मैंने ऐसे सभी "Trolls" को बता दूं कि उस समय मैंने जन्म नहीं लिया था, और अगर उस समय मैंने जन्म लिया होता तो मैं "उसका" भी विरोध करता ।
क्या जाति - धर्म को देख करके किसी "अपराधी" को "निर्दोष" कहा जाना चाहिए ?
क्या काला - गोरा देख करके "गलत" को "सही" कहा जा सकता है ?
क्या भाई द्वारा अपने "बहन" पर कुछ थोपा जाना सही है ?
जब लड़के को उसके मर्जी से कपड़े पहनने आदि की छूट है तो फिर लड़कियों को क्यो नहीं ?
अब इस तस्वीर को ध्यान से देखिए :-
सोशल मीडिया पर बहुत सारे लड़के इस तस्वीर को साझा करते हैं, इस तस्वीर के माध्यम से वे कहना चाहते हैं कि लड़कियों को अपने मर्जी से कपड़ा नहीं पहनना चाहिए, लड़कियों को उनके हद में रहना चाहिए, कुछ लोग तो छोटे कपड़ों को ही "बलात्कार" की वजह बताते हैं ।
ऐसे पुरुषवादी सोच वालो से मैं पूछना चाहता हूँ कोई तीन साल की "लड़की" को बुरखा या साड़ी कैसे पहना सकता है ? क्योकि आजकल तो छोटे - छोटे लड़कियों के साथ भी बलात्कार होता है ना !!
और तो और साड़ी व बुरखा पहनने वाली "महिलाओं" के साथ भी बलात्कार होता है ना ?
क्या "सेल" से बाहर निकलने का हक केवल ऐसा स्टेटस लगाने वालों को ही है ?
क्या तस्वीर में "She" के जगह पर "He" नहीं लिखा जा सकता है ?
क्या तस्वीर में "She" के जगह पर "He" नहीं लिखा जा सकता है ?
क्या हम ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर सकते है जहाँ कछुओं को भी सेल से बाहर निकल करके दुनिया देखने का हक हो !!
आखिर पुरुषों को महिलाओं के लिए नियम - कानून बनाने का हक किसने दिया ?
"थोपने की प्रवृत्ति" को छोड़ करके ही वास्तविक समानता की स्थापना किया जा सकता है ।
अगले ब्लॉग में जारी है ...
सुझावों व टिप्पणियों का स्वागत है
#BhartenduVimalDubey
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