Tuesday, 3 November 2020

सुप्रीम कोर्ट केवल मोदी सरकार के पक्ष में बोलने वालों को ही "अभिव्यक्ति की आजादी" देता है और बाकी को दंडित करता है !! इस साल अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े दस मामलों का हाल -

जनवरी से लेकर अब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट में आए 10 मामलों की स्क्रूटनिंग से एक नए पैटर्न का पता चलता है :- 

सुप्रीम कोर्ट ने इन दस मामलों में अरनब गोस्वामी, बिना डिग्री की पत्रकार नूपुर जे शर्मा, अमीष देवगन को राहत दी है लेकिन विनोद दुआ, हर्ष मंदर, कांग्रेस नेता पंकज पुनिया, डॉ० कफील खान और शरज़ील इमाम को राहत नहीं दी !  

आइए उपरोक्त पर थोड़ी चर्चा करें - 

1. पहला मामला रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत दी है ।
गोस्वामी ने अपनी याचिका में महाराष्ट्र में दाखिल एफआईआर रद्द करने की मांग की थी । पालघर में हुई दो साधुओं और एक ड्राइवर की लिंचिंग के बाद अरनब ने अपने टीवी डिबेट शो में 21 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर सवाल खड़े किए थे । इसके खिलाफ अरनब पर कई जगह एफआईआर दर्ज की गई थी । 19 मई को सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार को राहत देते हुए सिर्फ एक एफआईआर को छोड़कर सभी को रद्द करने का आदेश दिया था और कहा था कि एक ही घटना से संबंधित कई एफआईआर दर्ज करना “प्रक्रिया का दुरुपयोग है” और इसे रद्द किया जाना चाहिए । 

2. 25 जून को अदालत ने पत्रकार अमीश देवगन के खिलाफ उनके शो में धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में एफआईआर पर रोक लगा दी । SC ने जांच को स्थगित करते हुए कई स्थानों पर दायर एफआईआर को नोएडा स्थानांतरित कर दिया । 

3. 26 जून को, सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की अवकाश पीठ ने भाजपा समर्थक ऑप इंडिया की बिना डिग्री की पत्रकार नूपुर जे शर्मा और पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा दायर तीन अन्य लोगों के खिलाफ कई एफआईआर पर एक पक्षीय रोक लगाने की अनुमति दी और आगे की किसी भी सख्त कार्रवाई को निलंबित कर दिया । 
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हालांकि इसी तरह के अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत नहीं दिया क्योकि इन 6 मामलों में याचिकाकर्ता सत्तारूढ़ दल के समर्थक नहीं थे :- 
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4. कांग्रेस नेता पंकज पुनिया से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई को हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले मल्टीपल एफआईआर को रोकने के लिए दायर याचिका में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया । पुनिया के एक ट्वीट पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में इन जगहों पर एफआईआर हुई थीं .

5. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र शरज़ील इमाम पर देशद्रोह और हेट स्पीच के आरोप में इस साल जनवरी में कम से कम पांच राज्यों: असम, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मणिपुर में एफआईआर दर्ज की गई थी, उसके खिलाफ शरज़ील ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था । 26 मई को, शरज़ील ने अपने खिलाफ मुकदमों को दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग की, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं किया गया है । पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने शरज़ील की याचिका पर सुनवाई एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दी है । 
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अर्नब गोस्वामी व अमिश देवगन पर कई जगह FIR हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ही घटना से संबंधित कई एफआईआर दर्ज करना “प्रक्रिया का दुरुपयोग है” और इसे रद्द किया जाना चाहिए 
लेकिन पंकज पुनिया, शरजील इमाम व अन्य विपक्षियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट अपने ही बातों को भूल गया ? 
मतलब "अभिव्यक्ति के आजादी" का अधिकार केवल सत्ता पक्ष के पास ही रहेगा क्या ? 
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6. अरनब गोस्वामी, अमीष देवगन और नुपूर शर्मा के मामलों के विपरीत सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ आपराधिक जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया क्योकि  दुआ पर हिमाचल प्रदेश में भाजपा नेता श्याम कुमारसैन ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया है
और तो और जो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भाजपा समर्थक अर्नब गोस्वामी, अमिश देवगन और नूपुर के मामलों में अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहे हैं, वही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विनोद दुआ के केस का विरोध किया था !!
Height Of Hypocrisy ?? 
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बाकी के तीन मामले व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामुहिक है । 
7. कोविड-19 महामारी के मद्देनजर शाहीनबाग में  100 दिन के धरने को रोकने वाले प्रदर्शनकारियों ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और आरोप लगाया है कि पुलिस ने प्रदर्शन स्थल को साफ कर दिया है और संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक वार्ताकार टीम नियुक्त किया था। इस टीम ने प्रदर्शनस्थल पर जाकर बातचीत की थी। तब प्रदर्शकारियों ने विरोध स्थल पर एक हिस्से को खाली कर दिया था। मार्च में याचिका दायर करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में यह अब तक सूचीबद्ध नहीं हो सका है । 
8. मार्च में ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों से जुड़े एक मामले में सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर का केस सुनने से इनकार कर दिया था । सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मंदर की याचिका पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि वह लोगों को भड़काते हुए देखे गए थे। इसके बाद मंदर के वकील को अदालत ने मामले में बहस करने की अनुमति नहीं दी थी । 

9. अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के बाद संचार माध्यमों पर लगाए गए प्रतिबंधों से वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन से जुड़े एक मामले में हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं का हवाला देते हुए मामले के तथ्यों पर फैसला नहीं दिया। संयोग से, देश के अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्णय लेते समय, अदालत को “राज्य में आतंकवाद की पृष्ठभूमि” को ध्यान में रखना चाहिए ।
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10. इसी तरह का विरोधाभास नुपूर शर्मा और गोरखपुर के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफील खान के मामले में देखने को मिलता है । 
जिस सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर जे शर्मा को तुरन्त राहत दे दी , उसी सुप्रीम कोर्ट ने कफील खान के माँ नुज़हर परवीन से कहा कि हम आपको कोई राहत नहीं दे सकते हैं, आप हाई कोर्ट में जाये । 
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट में आजतक कफील खान की रिहाई पर फैसला नहीं हो सका है । 
UPDATE - 1 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉक्टर कफील पर रासुका लगाने संबंधी डीएम अलीगढ़ के 13 फरवरी 2019 के आदेश को रद्द कर दिया है। दुबारा रासुका की अवधि बढ़ाने को भी कोर्ट ने अवैध करार देते हुए कफील खान को रिहा करने का आदेश दिया था । 
अतः उत्तर प्रदेश सरकार का मन ना होते हुए भी डॉ० कफील खान को 2 सितंबर को रिहा कर दिया गया है । 
ध्यान रहे ये राहत सुप्रीम कोर्ट ने नहीं बल्कि हाइकोर्ट ने दिया है, हाइकोर्ट व कुछ न्यायधीशों में अभी रीढ़ की हड्डी बची हुई है ।
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अगर आप सरकार के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो सुप्रीम कोर्ट आपको कोई राहत नहीं देगा और आपको सम्बंधित हाइकोर्ट में जाने को कहेगा 
लेकिन अगर आप सरकार के पक्ष में बोलेंगे तो सुप्रीम कोर्ट तुरन्त आपको राहत दे देगा !  

नोट :- हम भारतीय संविधान का पूरा सम्मान करते हैं । 
हम "न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971" का भी पूरा आदर व सम्मान करते हैं जिसके अनुसार किसी मामले का निर्दोष प्रकाशन, न्यायिक कृत्यों की निष्पक्ष और उचित आलोचना तथा न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष पर टिप्पणी करना न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है । 

Image and Copyright :- #BhartenduVimalDubey 

Published - 27 अगस्त 2020 
Edited - 4 नवंबर 2020

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