क्या भारत मे अभी भी निष्पक्ष चुनाव होते है ? जब प्रधानमंत्री आए दिन चुनाव प्रचार करते रहते है तो फिर 18 - 18 घण्टा काम कब करते है ? अपराधियों को टिकट क्यो ? आइए विस्तार से जानने का प्रयास करते है कि क्या वास्तव में भारत मे "जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए शासन है ?" 1.👉 यूं तो नियमो के अनुसार 36 घण्टो के पहले चुनाव प्रचार बंद हो जाना चाहिए लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से एक नया ही प्रचलन शुरू हो गया - इधर वोटिंग होता रहता है और उधर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए सभी न्यूज़ चैनलों पर प्रधानमंत्री मोदी व अन्य भाजपा नेताओं के भाषण / चूनावी कार्यक्रम लाइव प्रसारित होते रहते है, जिस पर तथाकथित निष्पक्ष चुनाव आयोग भी अपने आँख - कान - मुँह बंद किए रहता है ; हालांकि यही न्यूज़ चैनल विपक्षी नेताओं के भाषणों / चुनावी कार्यक्रमों को 10 मिनट का भी कवरेज नहीं देते है और तो और जो चुनाव आयोग PM मोदी व अन्य भाजपा नेताओं के द्वारा बड़े से बड़े नियमो को तोड़ने पर "बिना सेल के रेडियो" के की तरह शांत रहता है, वही चुनाव आयोग विपक्षी नेताओं के मामूली से भी गलती पर नोटिस पर नोटिस भेजता है और जो करने का अधिकार उसके पास नहीं है वो भी कर डालता है ( जैसे चुनाव आयोग ने कमलनाथ का नाम मध्यप्रदेश उपचुनाव के स्टार प्रचारकों के सूची से हटा दिया, जिस पर सुप्रीम ने स्टे दिया ) ।
न्यूज़ चैनलों ने किन प्रत्याशियों व पार्टीयों को कितना समय कवरेज दिया है ? आप पाएंगे कि कई ऐसे प्रत्याशी जो नम्बर 2 पर आए या जीते उनको न्यूज़ चैनलों ने 10 मिनट क्या 5 मिनट का भी कवरेज नहीं दिया है ।
2013 से ही मीडिया का 90% कवरेज भाजपा के लिए रिजर्व है और बाकी 10% कवरेज शेष भारत के लिए ।
2.👉 खैर भाजपा के केंद्रीय सत्ता में आने बाद मीडिया ही नहीं चुनाव आयोग भी निष्पक्ष नहीं रहा - सुप्रीम कोर्ट के निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो रहे है ।
चुनाव आयोग का सिर्फ निष्पक्ष होना ही नहीं बल्कि नज़र आना भी ज़रूरी है । सैद्धांतिक रूप से कहा जाता है कि चुनाव आयोग अपने कामकाज में एक हद तक स्वायत्त रहा है, जो कि इस देश की ज़्यादातर संस्थाओं के मामले में शायद ही देखने को मिलता है किंतु क्या वास्तविकता में भी ऐसा ही है ? चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में भी पसन्द - ना पसंद का ख्याल रखा जाता है । अब हाल ही में नियुक्ति समिति के सदस्य अधिरंजन चौधरी के द्वारा आपत्ति करने के बाद भी मोदी जी के ऊपर किताब लिखने वाले RSS के करीबी पत्रकार उदय माहुरकर को सूचना आयुक्त बना दिया गया, अब बताइए क्या यह व्यक्ति मोदी सरकार के खिलाफ कोई सूचना देगा ?
संविधान की धारा 324 में चुनाव आयोग को मुक्त और निष्पक्ष चुनाव कराने के व्यापक अधिकार दिये गये हैं लेेेकिन क्या आयोग इनका उपयोग कर पाता है ? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मे सत्ताधारी राजनेताओं को ही सबसे अधिक शक्तिशाली समझा जाता है तो क्या इसका मतलब यह कि चुनाव आयोग सत्ताधारी दल की गुलामी करे ? ऐसे में तो चीन की तरह भारत में भी एक ही पार्टी सत्ता में काबिज रहेगी ?
ऐसे बहुत सारी घटनाएं है जो हमे आयोगों को संदेह के नजर से देखने पर मजबूर करती है, जिसके विषय मे कुछ वेबसाइटों ने लिखा भी है । हालांकि आम जनता की पहुंच ऐसे वेबसाइटों तक नहीं है और जिन न्यूज़ चैनलों को आम जनता देखती है, वे न्यूज़ चैनल "चाटूकारिता" में व्यस्त है ।
3.👉 वैसे तो भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है फिर भी यहाँ की जनता वोट देते समय "काम" के बजाए जाति - धर्म को तबज्जो देती है । इसके पीछे का मुख्य कारण मतदाताओं का कम पढ़ा लिखा होना है । यहाँ कोई अंगूठा टेक व्यक्ति भी वोट दे सकता है और "Law Maker" बनने के लिए चुनाव भी लड़ सकता है ।
"बीमारू" नाम से महसूर बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व कुछ अन्य राज्यो में अगर कोई बेकार प्रत्याशी किसी व्यक्ति को "शीशी" पकड़ा दे तो वह व्यक्ति सब कुछ भूल कर उसी शीशी देने वाले निक्कमे प्रत्याशी को ही वोट दे देता है ।
ऐसा नहीं है कि सभी लोग "शीशी" पर ही वोट देते है । समझदार लोग भी है लेकिन वे संख्या में कम है इसीलिए बहुमत गवारो की ही होती है । हालांकि चुनाव दर चुनाव यह प्रवृत्ति बदलती रहती है ।
हम किसी राज्य के जनता का अपमान नहीं कर रहे है, हम खुद उत्तर प्रदेश से तालकु रखते है और हमारे कई रिश्तेदार बिहार से तालकु रखते है ।
4.👉 बिहार चुनाव 2020 की तुलना आप दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 से कर सकते है -
काम, विकास व अपने रिपोर्ट कार्ड पर चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी को 53.38 % वोट के साथ 62 सीटे मिली थी जबकि शाहीन बाग को साम्प्रदायिक रंग दे करके हिन्दू - मुस्लिम पर चुनाव लड़ने वाली BJP को भी 38.87% वोटों के साथ 8 सीटे मिली थी ।
अब आप खुद सोचिए जब दिल्ली जैसे शहर मे 38% से अधिक लोगो को काम, विकास से अधिक हिन्दू - मुस्लिम जैसे मुद्दे पसन्द है तो फिर पिछड़े इलाकों की बात ही निराली है ।
विकास, नौकरी, काम के मुद्दों पर चुनाव लड़ने वाली तेजस्वी के नेतृत्व वाली महागठबंधन को बहुमत तो मिल जाएगा किंतु वोट प्रतिशत में BJP गठबंधन किसी से कम नहीं रहेगा । सीनियर सिटीजन जाति बिरादरी के मुद्दे पर BJP गठबंधन को ही वोट देंगे ।
5.👉 पहले राजनीतिक दलों की अपनी - अपनी विचारधारा होती थी जो उनकी पहचान होती थी जिसके साथ वे कभी भी समझौता नहीं करते थे किंतु अब शायद ही कोई ऐसा राजनीति दल, संगठन या नेता हो जिसकी कोई विचारधारा हो -
जनता वोट करती है कांग्रेस को लेकिन सरकार बन जाता है BJP का मध्यप्रदेश में जिसको जनता ने चुना वह सत्ता से बाहर ... जब सरकार विधायकों के बाजार व ED, CBI के छापों के द्वारा ही बनाना है तो हम बूथ पर जा करके, घण्टों लाइन में लग करके किसके लिए वोट करें ? महाराष्ट्र में विरोधी गुटों का सरकार .
2015 में जनता ने BJP + के खिलाफ JDU + RJD + कांग्रेस को वोट दिया था लेकिन फिर सरकार बन गयी BJP + JDU + LJP की ... मतलब नीतीश कुमार सभी पार्टीयों के सहयोग से मुख्यमंत्री रह चुके है .
शिवसेना व कांग्रेस का गठबंधन, BJP व PDP का गठबंधन, समाजवादी पार्टी व BSP का गठबंधन, माले व RJD का गठबंधन आदि को देखने के बाद विचारधारा व नैतिकता जैसे शब्द मजाक लगते है ।
सभी पार्टीयों, नेताओ, जनता, चुनाव आयोग व पूरे सिस्टम ने मिलकर के विचारधारा की ऐसी तैसी कर दी है, अब सब केवल मौकापरस्त राजनीति के द्वारा मलाईदार कुर्सी पाना चाहते है .
6.👉 सभी चुनावो के भाँती इस बिहार चुनाव में भी सभी राजनीतिक दलों ने बड़े मात्रा में दागियों को टिकट दिया है, जनता इन्हें वोट दे करके सदन में भी पहुँचा देगी ।
बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार 32 फीसद दागी उम्मीदवार हैं यानी जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि है, जिसमें से 25 फीसदी ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर अपराधों में मुकदमें लंबित हैं जबकि 2015 में ये आकड़ा 30 और 23 फीसद था । इतना ही नहीं, बिहार चुनाव में इस बार 243 में से 217 निर्वाचन क्षेत्र यानी 89 फीसद चुनाव क्षेत्र रेड एलर्ट श्रेणी में आते हैं जहां तीन या तीन से अधिक दागी उम्मीदवार मैदान में हैं । BJP, कांग्रेस, RJD, JDU, LJP समेत सभी राजनीतिक दलों ने प्रत्येक चुनावों के भांति ही इस चुनाव में भी बड़े पैमाने पर आपराधिक छवि वालों को टिकट दिया है । ये आंकड़े ADR ने जारी किए है ।
7.👉 अधिकांश चुनावो के तरह ही इस बार भी EVM में गड़बड़ी की खराब आ रही है । बिहार में कई जगहों पर EVM में से कहीं RJD, कहीं कांग्रेस तो कहीं लेफ्ट दलों के सामने वाला बटन गायब था । जैसा कि आपको पता है कि मई 2014 के पहले भाजपा के तमाम बड़े नेताओं ने EVM पर गम्भीर सवाल उठाए थे ।
8.👉 विधानसभा का चुनाव अकेले विधायक व मुख्यमंत्री चुनने का चुनाव नहीं होता है बल्कि विधानसभा चुनाव ही राज्यसभा के गणित व केंद्रीय सरकार के निरंकुश विधायी शक्ति को भी निर्धारित करता है । जैसा कि आपको पता होगा कि करीब 30 सालों से भारतीय संसद के उच्च सदन "राज्यसभा" में किसी भी पार्टी या UPA या NDA का बहुमत नहीं है ।
9.👉 शायद राज्यसभा में बहुत पाने के लिए ही नरेंद्र मोदी जी व पूरी केंद्रीय मंत्रिमंडल सभी विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री व केंद्रीय मंत्री पद के गरिमा को ताक पर रख करके एक मामूली पार्टी नेता के तरह "खटते" रहते है ।
आप खुद सोचिए जो प्रधानमंत्री पूरे मंत्रिमंडल के साथ विधानसभा चुनाव में प्रचार करता हो, क्या वह प्रधानमंत्री विपक्षी पार्टी के सरकार बनने पर वहाँ के सरकार व जनता के साथ "न्याय" करेगा ?
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के जीतने पर भाजपा नेताओ के स्वामित्व वाले न्यूज़ चैनलों ने तो सभी हदों को पार करते हुए पूरे दिल्ली के जनता व "आप" को उल्टा सीधा बोलना शुरू कर दिया था - पश्चिम बंगाल का देखते ही है कि कैसे पूरी केंद्रीय मंत्रिमंडल वहाँ के सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करती है । महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि सभी राज्यों में केंद्रीय सरकार केंद्रीय एजेंसियों के द्वारा वहाँ के विपक्षी सरकारो को अस्थिर करने की कोशिश करती रहती है ।
दिल्ली व पांडुचेरी में तो उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार को ऊगली करते रहते है । पश्चिम बंगाल, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि प्रदेशों के राज्यपाल महोदय तो संवैधानिक मर्यादाओं को भूल कर बिल्कुल किसी लोकल भाजपा नेता के तरह व्यवहार करते है
और हाँ मीडिया व जनता चुनाव प्रचार को भी प्रधानमंत्री का काम बताती है ।
आप खुद सोचिए जब प्रधानमंत्री पूरे केंद्रीय मंत्रिमंडल के साथ आए दिन चुनाव प्रचार करते रहते है तो फिर 18 घण्टे काम कब करते है ? क्या कार्यकर्ताओं से बात करना, चुनाव प्रचार करना, LED लगा करके डिजिटल रैली आदि भी प्रधानमंत्री व सरकार के कामो में जोड़ा जाता है ?
● Twitter :- बिहार चुनाव भविष्यवाणी .
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◆ Word Press Blog :- CAA का विरोध करना देशद्रोह नहीं है .
हमारा उद्देश्य किसी के भावनाओ को ठेस पहुंचाना नहीं है ... हमने यह लेख भारतीय संविधान के मर्यादाओं में रहते हुए लिखे है ।
धन्यवाद
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