Sunday, 15 November 2020

कांग्रेस की नाकामी, लेफ्ट का स्वार्थीपन, AIMIM का सेंधमारी या चुनाव धांधली :- महागठबंधन के हारने के पीछे का क्या कारण है ?

बिहार चुनाव में महागठबंधन के हार के कारण और मायने क्या है ? 

1. ओवैसी ने महागठबंधन को पहुँचाया भयंकर नुकसान :- 
सीमांचल में किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिले के अंतर्गत कुल 24 विधानसभा सीटें है । 
AIMIM ने बिहार चुनाव में 20 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 14 कैंडिडेट सीमांचल के इलाके में थे । AIMIM ने अमौर, कोचाधमान, बहादुरगंज, बैसी और जोकीहाट कुल 5 सीट पर बड़ी जीत दर्ज की और बाकी के 15 सीटों पर वोट काटकर आरजेडी को तगड़ा नुकसान पहुंचाया ।
 चुनाव प्रचार के दौरान भी ओवैसी ने सत्ताधारी NDA को छोड़ RJD के नेतृत्व वाले महागठबंधन  पर जमकर निशाना साधा था और सीमांचल की अनदेखी का आरोप लगाया था । 
सीमांचल में NDA को 12, ओवैसी को 5 और RJD + को 7 सीटे मिली है । 

2. चिराग पासवान ने भी महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया ? :- एक तरफ जहाँ ने LJP ने BJP को "बड़ा भाई" बना दिया वही लोगो को भ्रम हुआ कि नीतीश कुमार कभी भी पाला बदल सकते है इसीलिए जहाँ BJP नहीं लड़ रही है वहाँ LJP को ही वोट देना सही होगा - 
चुनावी आंकड़े बता रहे हैं कि चिराग पासवान की लोजपा ने राजद को 12 सीटों का नुकसान किया और कांग्रेस को 10 सीटों का. भाकपा माले को भी 2 सीटें पर हरवा दिया. जाहिर है चिराग की पार्टी ने 24 सीटों पर महागठबंधन का भी खेल खराब कर दिया । 

3. कांग्रेस अपने साथ महागठबंधन को ले डूबी ? :- 
तो जैसे कि मैंने चुनाव शुरू के पहले ही बता दिया था कि तेजस्वी यादव ने निक्कमी कांग्रेस को 70 सीटें दे करके खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है , अब चुनाव परिणाम ने भी मेरी बातो पर मुहर लगा दी है । 

लेफ्ट पार्टीयों ने 55.19% स्ट्राइक रेट के साथ 29 मे से 16 सीटे जीती, RJD ने 52.08% स्ट्राइक रेट के साथ 144 में से 75 सीटे जीती और कांग्रेस ने Passing Marks से कम 27.14% स्ट्राइक रेट के साथ 70 मे से मात्र 19 सीटे जीती हैै । 
कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने तो प्रचार भी नहीं किया था .
आंकड़े बताते है कि तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार "कांग्रेस" ने जिस भी दल से गठबंधन किया है, उसको भी अपने साथ ले डूबा है । 

4. लेफ्ट पार्टीयो का स्वार्थीपन :- पूरे चुनाव को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि सहित लेफ्ट के सभी स्टार प्रचारक, छात्र नेता केवल अपने ही सीट पर ध्यान केंद्रित किए रहे - लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि RJD + ने कन्हैया कुमार व अन्य लेफ्ट नेताओ को सभी सीटों पर प्रचार करने ही नहीं दिया , 
जो भी हो इससे महागठबंधन के प्रदर्शन पर असर तो पड़ा ही है । 

5. मोदी फैक्टर :- महागठबंधन और NDA के कुल वोटों में मात्र 0.1% का ही अंतर है, अतः इसे मोदी लहर नहीं कहा जा सकता है - 
हालांकि मोदी के चुनाव में "खटने" से BJP को फायदा तो हुआ ही है - 
लेकिन अब BJP बिना लोकल चेहरे के "मोदी" के बल पर सभी विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकती है । 
लोगो को विधानसभा ( मुख्यमंत्री ) और लोकसभा ( प्रधानमंत्री ) के चुनाव का अंतर पता है । 

6. मतगणना में धांधली, प्रशासन का दुरुपयोग :- 
कई सीटों पर महागठबंधन के प्रत्याशियों को मात्र 12 वोटों से हारा हुआ घोषित कर दिया गया है . 

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