Monday, 14 September 2020

आज़ाद भारत का रॉलेट एक्ट - UP SSF

आखिर हम UPSSF को आजाद भारत का रॉलेट एक्ट क्यो कह रहे है ? 
और "उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल" ( UPSSF ) क्या है ? इसका विरोध क्यो हो रहा है ? क्या UPSSF लोकतंत्र के लिए घातक है ? 

आइए पहले थोड़ा फ़्लैश बैक में चलते है और याद करते है कि किस तरह भाजपा ( सरकार ) ने बड़े जोर-शोर से 13 अप्रैल 2019 को जलियांवाला बाग नरसंहार की 100वीं बरसी मनाया थी 
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1. ये जलियांवाला बाग हत्याकांड क्या है/था 

जालियाँवाला बाग हत्याकांड भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के निकट जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 ( बैसाखी के दिन) हुआ था। रॉलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी जिसमें जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं, जिसमे अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए । 
यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। माना जाता है कि यह घटना ही भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत बनी । 

१९९७ में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी । २०१३ में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे। विजिटर्स बुक में उन्होंनें लिखा कि "ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी ।  

2. रॉलेट एक्ट में ऐसा क्या था कि इतने बड़े पैमाने पर उसका विरोध हो रहा था ? 

रॉलेट नामक कानून 1919 ई. में अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित कानून था ।  
रॉलेट एक्ट का सरकारी नाम The Anarchical and Revolutionary Crime Act of 1919 था । 
इसे काला कानून भी कहते है ।

इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए उसे जेल में बंद कर सके 
मतलब अगर कोई मुकदमा ना किया हो तो भी "अफसर" ऐसे ही किसी को "उठा" सकते थे क्योकि इस क़ानून के तहत अपराधी को उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का प्रारंभिक अधिकार भी समाप्त कर दिया गया था ।  
वास्तव में क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के नाम पर ब्रिटिश सरकार भारतीयों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त कर देना चाहती थी । इस कानून द्वारा वह चाहती थी कि भारतीय किसी भी राजनीतिक आंदोलन में भाग न ले । 
कुल मिलाकर इस कानून का उद्देश्य देश और सरकार के बीच के अंतर को समाप्त करके, लोगो के मौलिक अधिकारों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना और बचे खुचे लोगो को भी पूर्ण गुलाम बनाना था । 

3. अब बात करते है कि "UPSSF" क्या है

मानसून सत्र में विधान मंडल से पारित "उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल विधेयक, 2020" को राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद यह अधिनियम की शक्ल में लागू हो गया है । 
 "इमेज - अमर उजाला ब्यूरो"  

प्रस्तुत इमेज व उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दी गई सूचना के आधार पर कुछ मूलभूत सवाल / आपत्तियां -

a. इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशों के मद्देनजर यूपी एसएसएफ के गठन का निर्णय किया गया है । 
इसके क्या मायने है ? 
क्या कोर्ट भी "रॉलेट एक्ट" जैसे कानून का समर्थन करता है ? ठहरिए मैं न्यायालय पर सवाल नही खड़े कर रहा हूँ और ना ही मैं न्यायालय की अवमानना नहीं कर रहा हूँ बल्कि मैं संविधान द्वारा दिये गए अधिकारों का उपयोग करते हुए अपनी शंकाएं व्यक्त कर रहा हूँ
 ( आज के दौर में बताना जरूरी है कि सवाल करना हमारा संवैधानिक अधिकार है और संविधान सभी कानूनों व सरकार से ऊपर है । ) 

b. निजी कम्पनियां भी लाभ ले सकेंगी मतलब SSF भी अंबानी व अडानी के लिए ही काम करेगा ? 
अरे, अधिकांश कंपनियों के मालिक विश्व के चौथे नंबर के धनी व्यक्ति व "भाजपा के प्रिय" अंबानी व अडानी ही है ना ? 

c. बिना सरकार के इजाजत के कोर्ट भी नहीं ले सकेगा संज्ञान ... तो क्या योगी सरकार जिसे अपना धुर विरोधी मानती हैै, जिसे बिना SSF के 6 महीनों तक जेल में रखी थी , अरे वही डॉ० कफ़ील खान और अन्य को कभी इज्जात देगी ? 
नहीं ना , मतलब तो ऐसे लोग हमेशा जेल में ही "सड़ते" रहेंगे ? 
 
d. SSF कर्मियों पर केस नहीं ... हॉल ही में एक SP ने एक व्यापारी से 6 लाख की रिश्वत मांगी थी, फिर उस व्याापारी ने एक वीडियो बना करके वायरल किया था , अंत मे उस व्यापारी की मौत हो गई ( न्यूज़ में देखा ही होगा ) ... तो क्या SSF के सभी कर्मी दूध के धुले होंगे ? क्या उनके मन मे सत्ताधारी दल के "वोट बैंक" के मुताबिक काम करके "प्रमोशन" पाने की लालसा नहीं होगी ? ... या क्या कोई SSF कर्मी उस SP की तरह किसी की हत्या नहीं करवा सकता है ? करवा सकता है ना ? तो फिर SSF कर्मियों को जांच से छूट क्यो ? .... 

e. हर कर्मी हमेशा ड्यूटी पर माना जाएगा ... मतलब अगर किसी SSF कर्मी का उसके किसी पड़ोसी के साथ झगड़ा हुआ तो क्या वह SSF कर्मी अपने पद का गलत उपयोग नहीं करेगा
 ( जो वास्तव में ड्यूटी पर नहीं था क्योकि कोई 24 घण्टे की ड्यूटी नहीं कर सकता है ) 
★ 
 4. मुझे पता है कि इन सवालों पर मुझे किस तरीके का जबाब मिलेगा - एक दृष्टि उस पर भी ( सम्भावना )
 सब तेरे तरह नहीं होते है । 
सरकार पर विश्वास करना सीखो । 
तुझे केवल कमियां निकाले ही आता है ।
अरे, सुन ये योगी सरकार है , टोटी चोर अखिलेश या मूर्ति बाज मायावती की सरकार नहीं । 

लेकिन वास्तविकता तो आपको पता ही है कि कैसे एक मामूली सा कांस्टेबल भी लोगो को अपनी धौक दिखाता है ? 
दिल्ली दंगो को ले करके भी दिल्ली पुलिस पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे है - 
भाजपा ने खुद सुशांत केस और पालघर केस को ले करके मुंबई ( महाराष्ट्र ) पुलिस पर कई तरह के सवाल खड़े किए है - 
सोचिए जब दिल्ली व मुंबई पुलिस जैसे "काबिल" फ़ोर्स पर सवाल खड़े हो सकते है तो फिर मुँह से "ढाय - ढाय" की आवाज निकालने वाली "यूपी पुलिस" व सरकार तो पक्षपात नाकामियों के लिए बहुत पहले से बदनाम है ।  

5. रॉलेट एक्ट और UPSSF में समानता :- 

रॉलेट एक्ट के तरह ही UPSSF द्वारा "बल" ( सरकार ) को कुछ ऐसी शक्तियां दी गई है जिसे कोर्ट में चुनौती ना दी जा सके और सरकार विरोधी आवाजो को कुचला जा सके ... 
 रॉलेट एक्ट की तरह ही UPSSF का उपयोग पुलिस कर्मी अपने निजी हित के लिए कर सकते है,  कार्यवाही की धमकी दे करके रिश्वत की मांग कर सकते है ... 
गौरतलब हो कि रॉलेट एक्ट का विरोध करते हुए हमारे पूर्वज "जलियांवाला बाग" में शहीद हो गए थे जिससे हम "स्वतंत्रता" पूर्व जीवन जी सके । 
  UPSSF आजाद भारत का रॉलेट एक्ट है या नहीं ? इसका निर्णय आप खुद करे । 

"Uttar Pradesh Special Security Force" जैसे अधिनियम लोकतंत्र के लिए घातक है या नहीं ? इसका निर्णय भी खुद आप ही कीजिए । 
वैसे रॉलेट एक्ट और UPSSF में एक मामूली अंतर है कि रॉलेट एक्ट एक विदेशी सरकार द्वारा लाया गया था जबकि UPSSF "जनता द्वारा चुनी हुई पूर्ण बहुमत वाली सरकार" द्वारा लाया गया है । 

इस कानून को प्रथम दृष्टया देखने पर जो "कमियां" नजर आई है हमने वही यहाँ लिखा है , 
जब सरकार SSF के लिए नियम - उपनियम बनाएगी, जब इसके बटालियन का निर्धारण होगा , तब कही जा करके इसके मुख्य "लोकतंत्र विनाशी शक्तियां" प्रकाश में आएगी, वैसे उसके लिए भी हमको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी क्योकि भारत मे "पत्रकारिता" विलुप्त होने के कगार पर है । 

नोट - योगी आदित्यनाथ जब सासंद थे तो अखिलेश यादव सरकार में पुलिस कार्यवाही से परेशान हो करके भरी लोकसभा में रोए थे, मतलब भारत अभी भी लगभग लोकतंत्र ही है, कही भाजपा सत्ता से बाहर गयी तो फिर नई सरकार भी इस कानून का गलत इस्तेमाल कर सकती है ना ? ( ताकि सनद रहे ) 



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