Sunday, 15 November 2020

क्या ओवैसी ने कहा है कि मोदी के साथ मिलकर करूंगा कांग्रेस का सफाया ? Fact Check

चुनाव विश्लेषकों के अनुसार ओवैसी की पार्टी AIMIM ने सीमांचल में विपक्षी महागठबंधन के वोट काटे जिससे तेजस्वी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए इसी के बाद से एक पेपर कटिंग वायरल हो रहा है - 
मोदी के साथ मिलकर करेंगे कांग्रेस का सफाया - ओवैसी 

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में अकबरुद्दीन ओवैसी को यह कहते हुए सुना गया कि नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर वह कांग्रेस का सफाया कर देंगे । 

कुछ Keywords व "Image" Search करने पर हमे बहुत आसानी से पता चल गया कि हाँ असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने ऐसा कहा था 
लेकिन ये बिहार चुनाव 2020 दौरान का व्यक्त्व नहीं है । 

पत्रिका न्यूज़ / आज तक व कुछ अन्य न्यूज़ आउटलेट्स ने भी इस के बारे में खबर लिखा है । 
ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव के लिए 30 जनवरी 2016 को बाबा नगर में अकबरुद्दीन ओवसी ने एक जनसभा में यह बात कही है। कांग्रेस नेताओं को 'गांधियों के दास' करार देते हुए ओवैसी ने कहा कि नरेंद्र मोदी के साथ मैं सारे देश से कांग्रेस का साफया करूंगा । लोकसभा चुनाव में मोदी के नारे 'सबका साथ सबका विकास' पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद सिर्फ एक चाय वाले का ही विकास हुआ है ।
 अतः वायरल वीडियो अधूरा है । 

अकबरुद्दीन के बयान पर पलटवार करते हुए कांग्रेस नेता हनुमंत राव ने कहा था कि बीजेपी और ओवैसी बंधुओं के बीच सांठगांठ चल रही है ।
आप भी बड़े आसानी से "फेक न्यूज़"को पहचान सकते है - 

आगे से अब आपको WordPress पर भी मेरे blogs पढ़ने को मिलेंगे :- Bhartendu Vimal Dubey . 




कांग्रेस की नाकामी, लेफ्ट का स्वार्थीपन, AIMIM का सेंधमारी या चुनाव धांधली :- महागठबंधन के हारने के पीछे का क्या कारण है ?

बिहार चुनाव में महागठबंधन के हार के कारण और मायने क्या है ? 

1. ओवैसी ने महागठबंधन को पहुँचाया भयंकर नुकसान :- 
सीमांचल में किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिले के अंतर्गत कुल 24 विधानसभा सीटें है । 
AIMIM ने बिहार चुनाव में 20 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 14 कैंडिडेट सीमांचल के इलाके में थे । AIMIM ने अमौर, कोचाधमान, बहादुरगंज, बैसी और जोकीहाट कुल 5 सीट पर बड़ी जीत दर्ज की और बाकी के 15 सीटों पर वोट काटकर आरजेडी को तगड़ा नुकसान पहुंचाया ।
 चुनाव प्रचार के दौरान भी ओवैसी ने सत्ताधारी NDA को छोड़ RJD के नेतृत्व वाले महागठबंधन  पर जमकर निशाना साधा था और सीमांचल की अनदेखी का आरोप लगाया था । 
सीमांचल में NDA को 12, ओवैसी को 5 और RJD + को 7 सीटे मिली है । 

2. चिराग पासवान ने भी महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया ? :- एक तरफ जहाँ ने LJP ने BJP को "बड़ा भाई" बना दिया वही लोगो को भ्रम हुआ कि नीतीश कुमार कभी भी पाला बदल सकते है इसीलिए जहाँ BJP नहीं लड़ रही है वहाँ LJP को ही वोट देना सही होगा - 
चुनावी आंकड़े बता रहे हैं कि चिराग पासवान की लोजपा ने राजद को 12 सीटों का नुकसान किया और कांग्रेस को 10 सीटों का. भाकपा माले को भी 2 सीटें पर हरवा दिया. जाहिर है चिराग की पार्टी ने 24 सीटों पर महागठबंधन का भी खेल खराब कर दिया । 

3. कांग्रेस अपने साथ महागठबंधन को ले डूबी ? :- 
तो जैसे कि मैंने चुनाव शुरू के पहले ही बता दिया था कि तेजस्वी यादव ने निक्कमी कांग्रेस को 70 सीटें दे करके खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है , अब चुनाव परिणाम ने भी मेरी बातो पर मुहर लगा दी है । 

लेफ्ट पार्टीयों ने 55.19% स्ट्राइक रेट के साथ 29 मे से 16 सीटे जीती, RJD ने 52.08% स्ट्राइक रेट के साथ 144 में से 75 सीटे जीती और कांग्रेस ने Passing Marks से कम 27.14% स्ट्राइक रेट के साथ 70 मे से मात्र 19 सीटे जीती हैै । 
कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने तो प्रचार भी नहीं किया था .
आंकड़े बताते है कि तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार "कांग्रेस" ने जिस भी दल से गठबंधन किया है, उसको भी अपने साथ ले डूबा है । 

4. लेफ्ट पार्टीयो का स्वार्थीपन :- पूरे चुनाव को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि सहित लेफ्ट के सभी स्टार प्रचारक, छात्र नेता केवल अपने ही सीट पर ध्यान केंद्रित किए रहे - लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि RJD + ने कन्हैया कुमार व अन्य लेफ्ट नेताओ को सभी सीटों पर प्रचार करने ही नहीं दिया , 
जो भी हो इससे महागठबंधन के प्रदर्शन पर असर तो पड़ा ही है । 

5. मोदी फैक्टर :- महागठबंधन और NDA के कुल वोटों में मात्र 0.1% का ही अंतर है, अतः इसे मोदी लहर नहीं कहा जा सकता है - 
हालांकि मोदी के चुनाव में "खटने" से BJP को फायदा तो हुआ ही है - 
लेकिन अब BJP बिना लोकल चेहरे के "मोदी" के बल पर सभी विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकती है । 
लोगो को विधानसभा ( मुख्यमंत्री ) और लोकसभा ( प्रधानमंत्री ) के चुनाव का अंतर पता है । 

6. मतगणना में धांधली, प्रशासन का दुरुपयोग :- 
कई सीटों पर महागठबंधन के प्रत्याशियों को मात्र 12 वोटों से हारा हुआ घोषित कर दिया गया है . 

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क्या परिणाम को सत्ताधारी NDA के पक्ष में करने के लिए चुनाव आयोग प्रशासन ने मतगणना में धांधली किया है ? बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में "EVM हैकिंग" से बड़ा "किस्सा" .. सबूतों के साथ -

अभी तक विपक्षी दलों के द्वारा केवल यह आरोप लगाया जाता था कि भाजपा EVM हैकिंग के द्वारा चुनाव जीत रही है - लेकिन बिहार चुनाव 2020 में EVM के साथ - साथ चुनाव प्रक्रिया - मतगणना व परिणाम घोषणा पर गम्भीर आरोप लग रहे है, विपक्षी पार्टियों व विशेषज्ञों ने इस सम्बंध में कई सबूत भी पेश किए है लेकिन चुनाव आयोग चुप्पी साधे हुए है - पढ़िए 

मतगणना शुरू होने के घण्टो बाद तक महागठबंधन 122 के जादुई आकांडो को पार किए हुए था , पोस्टल बैलेट में तो BJP ही सैदव आगे रहती थी , ऐसे में सभी जानकर मान के चल रहे थे कि अगर MGB पोस्टल बैलेट में क्लीन स्वीप कर रहा है तो फिर तेजस्वी की 2/3 बहुमत की सरकार बड़े आराम से बन जाएगी . मीडिया में मोदी जी के जगह पर नड्डा जी का तस्वीर आ गया था . JDU के महासचिव K.C. त्यागी ने तो हार भी स्वीकार कर लिया था संबित पात्रा के जगह पर शाहनवाज हुसैन आ चुके थे लेकिन फिर EVM खुलते ही NDA ने ऐसी बढ़त बनाई की फिर MGB कभी आगे ही नहीं निकल सका . 
  सभी Exit Poll फिस्सडी साबित हो गए


👉 मेरा यह सवाल एकदम जायज है क्योकि मध्यप्रदेश - BJP सरकार की मंत्री इमरती देवी उपचुनाव के दौरान कही थी कि हम केंद्र व राज्य दोनों जगह सत्ता में है, जिस भी कलक्टर को फ़ोन करेंगे वही हमको चुनाव जीता देगा  ,
क्या यह कोई छोटी बात है ? क्या पहले भी ऐसा किसी ने कहा है ?
अब जब कोई सत्ताधारी दल का मंत्री ऐसा बनाया देगा तो फिर EVM, प्रशासन, चुनाव आयोग व न्यायालय पर अपने आप ही सवाल खड़े होंगे -

👉 RJD ने 119 प्रत्याशियों के एक लिस्ट के साथ ट्वीट किया कि इन सभी प्रत्याशियों को रिटर्निंग अधिकारी ने विजयी घोषित कर दिया गया था लेकिन अब इन्हें सर्टिफिकेट नहीं दिया जा रहा है 
चु० आयोग ने अभी तक इतने गम्भीर आरोप का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया है । चु० आयोग ने केवल इतना कहा कि कोई भी हमारे वेबसाइट पर परिणाम देख सकता है । 

कांग्रेस - RJD के लाख कहने के बाद भी चुनाव आयोग ने Recounting नहीं करवाया । 

👉 चर्चित मुखिया रितु जायसवाल ने मतगणना में धांधली का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को चिठ्ठी लिखा है 
 चु० आयोग ने अभी तक संतोषजनक जबाब नहीं दिया है कि आखिर 600 बैलेट वोटों की गिनती क्यो नहीं की गई । 
👉 RJD के निवर्तमान विधायक के पुनर्मतगणना के मांग को खारिज कर दिया गया जबकि इनका आरोप गम्भीर है । 12 मतों से तो प्रधानी के चुनाव में हार जीत नहीं होता है - 
👉 प्रत्येक चुनावो के तरह ही इस बिहार चुनाव में भी मतदान के समय भी EVM में गड़बड़ी की शिकायत आती रही थी कुछ न्यूज़ पोर्टलों ने इसके विषय में लिखा भी था जिसे आप गूगल सर्च कर द्वारा देख सकते है । 

👉 इसके अलावा ऐसे बहुत सारे सीट थे जहाँ पोस्टल बैलेट की गिनती ही नहीं हुई, कही पहले महागठबंधन को जीत मिल गया था लेकिन फिर उन्हें हारा हुआ घोषित कर दिया गया, NDA के प्रत्याशियों ने बहुत कम अंतराल से जीत दर्ज की और महागठबंधन के माँग करने पर फिर पुनर्मतगणना नहीं किया गया । 

 हिलसा में 12 वोट से JDU के प्रेम मुखिया जीत गए.
बारबीघा में 113 वोट से JDU के सुदर्शन कुमार जीत गए  
भोरे में 462 वोट से JDU के सुनील कुमार जीत गए.
मटिहानी में 333 वोट से LJP के राज कुमार सिंह जीत गए. 
👆 इन सभी सीटों पर बिना संतोष जनक जवाब दिए ही महागठबंधन के पुनर्मतगणना के माँग को खारिज कर दिया गया 
जबकि आयोग ने लगभग NDA के सभी आपत्तियों को सुना और उसका निवारण किया ।

👉 NDA और महागठबंधन के बीच में केवल 12 हजार 270 वोटों का ही अंतर है । 
वोट प्रतिशत में भी केवल 0.1 का अंतर है । 
0.1 % वोट के अंतर से 15 सीटों का अंतर कैसे हो गया ? क्या ये हमारे चुनावी प्रक्रिया की कमी है ? जो सबसे बड़ी पार्टी को विपक्ष में बैठना पड़ता है .

👉 विपक्षी महागठबंधन को NDA से दुगुने पोस्टल बैलेट वोट मिले है 
तो क्या इसीलिए बड़े पैमाने पर पोस्टल बैलेट को रद्द किया गया है ? 

👉 महागठबंधन के अलावा अन्य दलों / प्रत्याशियों ने भी गम्भीर आरोप लगाए गए है - 
लंदन से पढ़ाई करने वाली The Plurals Party 
कि अध्यक्षा पुष्पम प्रिया चौधरी ने भी गम्भीर आरोप लगााये है 
लेकिन चु० आयोग ने किसी भी सवाल / आरोप का संतोषजनक जवाब नहीं दिया है ।

👉  जैसा कि आपको पता है कि #VVPAT को एक साल तक रखने का प्रावधान है लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव के VVPAT को 4 महीनों के अंदर ही नष्ट कर दिया गया था और हाँ इस पर मीडिया, न्यायालय सभी ने चुप्पी साधी रही । 
ये जानकारी The Print की पूनम अग्रवाल को एक RTI जवाब में मिला था 
हालांकि पूनम अग्रवाल को इस सम्बंध में संतोषजनक जवाब नहीं मिला है, उन्होंने फिर से RTI डाला है ।

👉 2013 के पहले अनेको बार BJP के बड़े बड़े नेताओं ने EVM पर सवाल उठाए थे - तब कांग्रेस सरकार ने कुछ नहीं किया अब BJP सरकार कुछ नहीं कर रही है । 
👉 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रक्रिया पर कई गम्भीर सवाल खड़े किए है, सोचिए जब अमेरिका जैसे देश मे चुनाव धांधली हो सकती है तो फिर भारत मे क्यो नहीं ? 
 वैसे भारत मे भी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द किया जा चुका है ।
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बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम - 
NDA - 225 
BJP - 74   JDU - 43   HAM - 4   VIP - 4 
महागठबंधन - 110 
RJD - 75.    कांग्रेस - 19    CPI ML - 12    
CPI - 2.      CPM - 2 
अन्य - 8 
AIMIM - 5   LJP - 1.  BSP - 1.   IND - 1 

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Tuesday, 3 November 2020

चुनाव के दिन भी लाइव प्रचार, आयोग का पक्षपात रवैया, वोटिंग पद्धति, मौकापरस्त राजनीति, विचारधारा की ऐसी तैसी, अपराधियों को टिकट, EVM में गड़बड़ी, राज्यसभा का गणित, प्रधानमंत्री का सभी चुनावो में खटना : बिहार चुनाव 2020 समेत सभी चुनावो की यही घिसीपिटी कहानी

क्या भारत मे अभी भी निष्पक्ष चुनाव होते है ? जब प्रधानमंत्री आए दिन चुनाव प्रचार करते रहते है तो फिर 18 - 18 घण्टा काम कब करते है ? अपराधियों को टिकट क्यो ? आइए विस्तार से जानने का प्रयास करते है कि क्या वास्तव में भारत मे "जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए शासन है ?"  1.👉  यूं तो नियमो के अनुसार 36 घण्टो के पहले चुनाव प्रचार बंद हो जाना चाहिए लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव से एक नया ही प्रचलन शुरू हो गया - इधर वोटिंग होता रहता है और उधर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए सभी न्यूज़ चैनलों पर प्रधानमंत्री मोदी व अन्य भाजपा नेताओं के भाषण / चूनावी कार्यक्रम लाइव प्रसारित होते रहते है, जिस पर तथाकथित निष्पक्ष चुनाव आयोग भी अपने आँख - कान - मुँह बंद किए रहता है ; हालांकि यही न्यूज़ चैनल विपक्षी नेताओं के भाषणों / चुनावी कार्यक्रमों को 10 मिनट का भी कवरेज नहीं देते है और तो और जो चुनाव आयोग PM मोदी व अन्य भाजपा नेताओं के द्वारा बड़े से बड़े नियमो को तोड़ने पर "बिना सेल के रेडियो" के की तरह शांत रहता है, वही चुनाव आयोग विपक्षी नेताओं के मामूली से भी गलती पर नोटिस पर नोटिस भेजता है और जो करने का अधिकार उसके पास नहीं है वो भी कर डालता है ( जैसे चुनाव आयोग ने कमलनाथ का नाम मध्यप्रदेश उपचुनाव के स्टार प्रचारकों के सूची से हटा दिया, जिस पर सुप्रीम ने स्टे दिया ) । 
न्यूज़ चैनलों ने किन प्रत्याशियों व पार्टीयों को कितना समय कवरेज दिया है ? आप पाएंगे कि कई ऐसे प्रत्याशी जो नम्बर 2 पर आए या जीते उनको न्यूज़ चैनलों ने 10 मिनट क्या 5 मिनट का भी कवरेज नहीं दिया है । 
 2013 से ही मीडिया का 90% कवरेज भाजपा के लिए रिजर्व है और बाकी 10% कवरेज शेष भारत के लिए । 

2.👉 खैर भाजपा के केंद्रीय सत्ता में आने बाद मीडिया ही नहीं चुनाव आयोग भी निष्पक्ष नहीं रहा - सुप्रीम कोर्ट के निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो रहे है । 
चुनाव आयोग का सिर्फ निष्पक्ष होना ही नहीं बल्कि नज़र आना भी ज़रूरी है । सैद्धांतिक रूप से कहा जाता है कि चुनाव आयोग अपने कामकाज में एक हद तक स्वायत्त रहा है, जो कि इस देश की ज़्यादातर संस्थाओं के मामले में शायद ही देखने को मिलता है किंतु क्या वास्तविकता में भी ऐसा ही है ? चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में भी पसन्द - ना पसंद का ख्याल रखा जाता है । अब हाल ही में नियुक्ति समिति के सदस्य अधिरंजन चौधरी के द्वारा आपत्ति करने के बाद भी मोदी जी के ऊपर किताब लिखने वाले RSS के करीबी पत्रकार उदय माहुरकर को सूचना आयुक्त बना दिया गया, अब बताइए क्या यह व्यक्ति मोदी सरकार के खिलाफ कोई सूचना देगा ?
संविधान की धारा 324 में चुनाव आयोग को मुक्त और निष्पक्ष चुनाव कराने के व्यापक अधिकार दिये गये हैं लेेेकिन क्या आयोग इनका उपयोग कर पाता है ? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मे सत्ताधारी राजनेताओं को ही सबसे अधिक शक्तिशाली समझा जाता है तो क्या इसका मतलब यह कि चुनाव आयोग सत्ताधारी दल की गुलामी करे ? ऐसे में तो चीन की तरह भारत में भी एक ही पार्टी सत्ता में काबिज रहेगी ? 
ऐसे बहुत सारी घटनाएं है जो हमे आयोगों को संदेह के नजर से देखने पर मजबूर करती है, जिसके विषय मे कुछ वेबसाइटों ने लिखा भी है । हालांकि आम जनता की पहुंच ऐसे वेबसाइटों तक नहीं है और जिन न्यूज़ चैनलों को आम जनता देखती है, वे न्यूज़ चैनल "चाटूकारिता" में व्यस्त है ।

3.👉 वैसे तो भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है फिर भी यहाँ की जनता वोट देते समय "काम" के बजाए जाति - धर्म को तबज्जो देती है । इसके पीछे का मुख्य कारण मतदाताओं का कम पढ़ा लिखा होना है । यहाँ कोई अंगूठा टेक व्यक्ति भी वोट दे सकता है और "Law Maker" बनने के लिए चुनाव भी लड़ सकता है । 
"बीमारू" नाम से महसूर बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व कुछ अन्य राज्यो में अगर कोई बेकार प्रत्याशी किसी व्यक्ति को "शीशी" पकड़ा दे तो वह व्यक्ति सब कुछ भूल कर उसी शीशी देने वाले निक्कमे प्रत्याशी को ही वोट दे देता है । 
ऐसा नहीं है कि सभी लोग "शीशी" पर ही वोट देते है । समझदार लोग भी है लेकिन वे संख्या में कम है इसीलिए बहुमत गवारो की ही होती है । हालांकि चुनाव दर चुनाव यह प्रवृत्ति बदलती रहती है । 
हम किसी राज्य के जनता का अपमान नहीं कर रहे है, हम खुद उत्तर प्रदेश से तालकु रखते है और हमारे कई रिश्तेदार बिहार से तालकु रखते है । 

4.👉 बिहार चुनाव 2020 की तुलना आप दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 से कर सकते है
काम, विकास व अपने रिपोर्ट कार्ड पर चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी को 53.38 % वोट के साथ 62 सीटे मिली थी जबकि शाहीन बाग को साम्प्रदायिक रंग दे करके हिन्दू - मुस्लिम पर चुनाव लड़ने वाली BJP को भी 38.87% वोटों के साथ 8 सीटे मिली थी । 
अब आप खुद सोचिए जब दिल्ली जैसे शहर मे 38% से अधिक लोगो को काम, विकास से अधिक हिन्दू - मुस्लिम जैसे मुद्दे पसन्द है तो फिर पिछड़े इलाकों की बात ही निराली है । 
विकास, नौकरी, काम के मुद्दों पर चुनाव लड़ने वाली तेजस्वी के नेतृत्व वाली महागठबंधन को बहुमत तो मिल जाएगा किंतु वोट प्रतिशत में BJP गठबंधन किसी से कम नहीं रहेगा । सीनियर सिटीजन जाति बिरादरी के मुद्दे पर BJP गठबंधन को ही वोट देंगे । 

5.👉 पहले राजनीतिक दलों की अपनी - अपनी विचारधारा होती थी जो उनकी पहचान होती थी जिसके साथ वे कभी भी समझौता नहीं करते थे किंतु अब शायद ही कोई ऐसा राजनीति दल, संगठन या नेता हो जिसकी कोई विचारधारा हो - 
जनता वोट करती है कांग्रेस को लेकिन सरकार बन जाता है BJP का मध्यप्रदेश में जिसको जनता ने चुना वह सत्ता से बाहर ... जब सरकार विधायकों के बाजार व ED, CBI के छापों के द्वारा ही बनाना है तो हम बूथ पर जा करके, घण्टों लाइन में लग करके किसके लिए वोट करें ? महाराष्ट्र में विरोधी गुटों का सरकार . 
2015 में जनता ने BJP + के खिलाफ JDU + RJD + कांग्रेस को वोट दिया था लेकिन फिर सरकार बन गयी BJP + JDU + LJP की ... मतलब नीतीश कुमार सभी पार्टीयों के सहयोग से मुख्यमंत्री रह चुके है . 
शिवसेना व कांग्रेस का गठबंधन, BJP व PDP का गठबंधन, समाजवादी पार्टी व BSP का गठबंधन, माले व RJD का गठबंधन आदि को देखने के बाद विचारधारा व नैतिकता जैसे शब्द मजाक लगते है । 


6.👉 सभी चुनावो के भाँती इस बिहार चुनाव में भी सभी राजनीतिक दलों ने बड़े मात्रा में दागियों को टिकट दिया है, जनता इन्हें वोट दे करके सदन में भी पहुँचा देगी । 
बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार 32 फीसद दागी उम्मीदवार हैं यानी जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि है, जिसमें से 25 फीसदी ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर अपराधों में मुकदमें लंबित हैं जबकि 2015 में ये आकड़ा 30 और 23 फीसद था । इतना ही नहीं, बिहार चुनाव में इस बार 243 में से 217 निर्वाचन क्षेत्र यानी 89 फीसद चुनाव क्षेत्र रेड एलर्ट श्रेणी में आते हैं जहां तीन या तीन से अधिक दागी उम्मीदवार मैदान में हैं । BJP, कांग्रेस, RJD, JDU, LJP समेत सभी राजनीतिक दलों ने प्रत्येक चुनावों के भांति ही इस चुनाव में भी बड़े पैमाने पर आपराधिक छवि वालों को टिकट दिया है । ये आंकड़े ADR ने जारी किए है । 

7.👉 अधिकांश चुनावो के तरह ही इस बार भी EVM में गड़बड़ी की खराब आ रही है । बिहार में कई जगहों पर EVM में से कहीं RJD, कहीं कांग्रेस तो कहीं लेफ्ट दलों के सामने वाला बटन गायब था । जैसा कि आपको पता है कि मई 2014 के पहले भाजपा के तमाम बड़े नेताओं ने EVM पर गम्भीर सवाल उठाए थे । 

8.👉 विधानसभा का चुनाव अकेले विधायक व मुख्यमंत्री चुनने का चुनाव नहीं होता है बल्कि विधानसभा चुनाव ही राज्यसभा के गणित व केंद्रीय सरकार के निरंकुश विधायी शक्ति को भी निर्धारित करता है । जैसा कि आपको पता होगा कि करीब 30 सालों से भारतीय संसद के उच्च सदन "राज्यसभा" में किसी भी पार्टी या UPA या NDA का बहुमत नहीं है ।

9.👉 शायद राज्यसभा में बहुत पाने के लिए ही नरेंद्र मोदी जी व पूरी केंद्रीय मंत्रिमंडल सभी विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री व केंद्रीय मंत्री पद के गरिमा को ताक पर रख करके एक मामूली पार्टी नेता के तरह "खटते" रहते है । 
आप खुद सोचिए जो प्रधानमंत्री पूरे मंत्रिमंडल के साथ विधानसभा चुनाव में प्रचार करता हो, क्या वह प्रधानमंत्री विपक्षी पार्टी के सरकार बनने पर वहाँ के सरकार व जनता के साथ "न्याय" करेगा ? 
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के जीतने पर भाजपा नेताओ के स्वामित्व वाले न्यूज़ चैनलों ने तो सभी हदों को पार करते हुए पूरे दिल्ली के जनता व "आप" को उल्टा सीधा बोलना शुरू कर दिया था - पश्चिम बंगाल का देखते ही है कि कैसे पूरी केंद्रीय मंत्रिमंडल वहाँ के सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करती है । महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि सभी राज्यों में केंद्रीय सरकार केंद्रीय एजेंसियों के द्वारा वहाँ के विपक्षी सरकारो को अस्थिर करने की कोशिश करती रहती है ।
दिल्ली व पांडुचेरी में तो उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार को ऊगली करते रहते है । पश्चिम बंगाल, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि प्रदेशों के राज्यपाल महोदय तो संवैधानिक मर्यादाओं को भूल कर बिल्कुल किसी लोकल भाजपा नेता के तरह व्यवहार करते है 
और हाँ मीडिया व जनता चुनाव प्रचार को भी प्रधानमंत्री का काम बताती है । 

आप खुद सोचिए जब प्रधानमंत्री पूरे केंद्रीय मंत्रिमंडल के साथ आए दिन चुनाव प्रचार करते रहते है तो फिर 18 घण्टे काम कब करते है ? क्या कार्यकर्ताओं से बात करना, चुनाव प्रचार करना, LED लगा करके डिजिटल रैली आदि भी प्रधानमंत्री व सरकार के कामो में जोड़ा जाता है ? 



हमारा उद्देश्य किसी के भावनाओ को ठेस पहुंचाना नहीं है ... हमने यह लेख भारतीय संविधान के मर्यादाओं में रहते हुए लिखे है । 
धन्यवाद 
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सुप्रीम कोर्ट केवल मोदी सरकार के पक्ष में बोलने वालों को ही "अभिव्यक्ति की आजादी" देता है और बाकी को दंडित करता है !! इस साल अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े दस मामलों का हाल -

जनवरी से लेकर अब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट में आए 10 मामलों की स्क्रूटनिंग से एक नए पैटर्न का पता चलता है :- 

सुप्रीम कोर्ट ने इन दस मामलों में अरनब गोस्वामी, बिना डिग्री की पत्रकार नूपुर जे शर्मा, अमीष देवगन को राहत दी है लेकिन विनोद दुआ, हर्ष मंदर, कांग्रेस नेता पंकज पुनिया, डॉ० कफील खान और शरज़ील इमाम को राहत नहीं दी !  

आइए उपरोक्त पर थोड़ी चर्चा करें - 

1. पहला मामला रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत दी है ।
गोस्वामी ने अपनी याचिका में महाराष्ट्र में दाखिल एफआईआर रद्द करने की मांग की थी । पालघर में हुई दो साधुओं और एक ड्राइवर की लिंचिंग के बाद अरनब ने अपने टीवी डिबेट शो में 21 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर सवाल खड़े किए थे । इसके खिलाफ अरनब पर कई जगह एफआईआर दर्ज की गई थी । 19 मई को सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार को राहत देते हुए सिर्फ एक एफआईआर को छोड़कर सभी को रद्द करने का आदेश दिया था और कहा था कि एक ही घटना से संबंधित कई एफआईआर दर्ज करना “प्रक्रिया का दुरुपयोग है” और इसे रद्द किया जाना चाहिए । 

2. 25 जून को अदालत ने पत्रकार अमीश देवगन के खिलाफ उनके शो में धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में एफआईआर पर रोक लगा दी । SC ने जांच को स्थगित करते हुए कई स्थानों पर दायर एफआईआर को नोएडा स्थानांतरित कर दिया । 

3. 26 जून को, सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की अवकाश पीठ ने भाजपा समर्थक ऑप इंडिया की बिना डिग्री की पत्रकार नूपुर जे शर्मा और पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा दायर तीन अन्य लोगों के खिलाफ कई एफआईआर पर एक पक्षीय रोक लगाने की अनुमति दी और आगे की किसी भी सख्त कार्रवाई को निलंबित कर दिया । 
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हालांकि इसी तरह के अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत नहीं दिया क्योकि इन 6 मामलों में याचिकाकर्ता सत्तारूढ़ दल के समर्थक नहीं थे :- 
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4. कांग्रेस नेता पंकज पुनिया से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई को हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले मल्टीपल एफआईआर को रोकने के लिए दायर याचिका में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया । पुनिया के एक ट्वीट पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में इन जगहों पर एफआईआर हुई थीं .

5. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र शरज़ील इमाम पर देशद्रोह और हेट स्पीच के आरोप में इस साल जनवरी में कम से कम पांच राज्यों: असम, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मणिपुर में एफआईआर दर्ज की गई थी, उसके खिलाफ शरज़ील ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था । 26 मई को, शरज़ील ने अपने खिलाफ मुकदमों को दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग की, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं किया गया है । पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने शरज़ील की याचिका पर सुनवाई एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दी है । 
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अर्नब गोस्वामी व अमिश देवगन पर कई जगह FIR हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ही घटना से संबंधित कई एफआईआर दर्ज करना “प्रक्रिया का दुरुपयोग है” और इसे रद्द किया जाना चाहिए 
लेकिन पंकज पुनिया, शरजील इमाम व अन्य विपक्षियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट अपने ही बातों को भूल गया ? 
मतलब "अभिव्यक्ति के आजादी" का अधिकार केवल सत्ता पक्ष के पास ही रहेगा क्या ? 
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6. अरनब गोस्वामी, अमीष देवगन और नुपूर शर्मा के मामलों के विपरीत सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ आपराधिक जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया क्योकि  दुआ पर हिमाचल प्रदेश में भाजपा नेता श्याम कुमारसैन ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया है
और तो और जो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भाजपा समर्थक अर्नब गोस्वामी, अमिश देवगन और नूपुर के मामलों में अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहे हैं, वही सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विनोद दुआ के केस का विरोध किया था !!
Height Of Hypocrisy ?? 
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बाकी के तीन मामले व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामुहिक है । 
7. कोविड-19 महामारी के मद्देनजर शाहीनबाग में  100 दिन के धरने को रोकने वाले प्रदर्शनकारियों ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और आरोप लगाया है कि पुलिस ने प्रदर्शन स्थल को साफ कर दिया है और संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक वार्ताकार टीम नियुक्त किया था। इस टीम ने प्रदर्शनस्थल पर जाकर बातचीत की थी। तब प्रदर्शकारियों ने विरोध स्थल पर एक हिस्से को खाली कर दिया था। मार्च में याचिका दायर करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में यह अब तक सूचीबद्ध नहीं हो सका है । 
8. मार्च में ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों से जुड़े एक मामले में सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर का केस सुनने से इनकार कर दिया था । सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मंदर की याचिका पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि वह लोगों को भड़काते हुए देखे गए थे। इसके बाद मंदर के वकील को अदालत ने मामले में बहस करने की अनुमति नहीं दी थी । 

9. अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के बाद संचार माध्यमों पर लगाए गए प्रतिबंधों से वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन से जुड़े एक मामले में हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं का हवाला देते हुए मामले के तथ्यों पर फैसला नहीं दिया। संयोग से, देश के अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्णय लेते समय, अदालत को “राज्य में आतंकवाद की पृष्ठभूमि” को ध्यान में रखना चाहिए ।
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10. इसी तरह का विरोधाभास नुपूर शर्मा और गोरखपुर के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कफील खान के मामले में देखने को मिलता है । 
जिस सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर जे शर्मा को तुरन्त राहत दे दी , उसी सुप्रीम कोर्ट ने कफील खान के माँ नुज़हर परवीन से कहा कि हम आपको कोई राहत नहीं दे सकते हैं, आप हाई कोर्ट में जाये । 
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट में आजतक कफील खान की रिहाई पर फैसला नहीं हो सका है । 
UPDATE - 1 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉक्टर कफील पर रासुका लगाने संबंधी डीएम अलीगढ़ के 13 फरवरी 2019 के आदेश को रद्द कर दिया है। दुबारा रासुका की अवधि बढ़ाने को भी कोर्ट ने अवैध करार देते हुए कफील खान को रिहा करने का आदेश दिया था । 
अतः उत्तर प्रदेश सरकार का मन ना होते हुए भी डॉ० कफील खान को 2 सितंबर को रिहा कर दिया गया है । 
ध्यान रहे ये राहत सुप्रीम कोर्ट ने नहीं बल्कि हाइकोर्ट ने दिया है, हाइकोर्ट व कुछ न्यायधीशों में अभी रीढ़ की हड्डी बची हुई है ।
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अगर आप सरकार के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो सुप्रीम कोर्ट आपको कोई राहत नहीं देगा और आपको सम्बंधित हाइकोर्ट में जाने को कहेगा 
लेकिन अगर आप सरकार के पक्ष में बोलेंगे तो सुप्रीम कोर्ट तुरन्त आपको राहत दे देगा !  

नोट :- हम भारतीय संविधान का पूरा सम्मान करते हैं । 
हम "न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971" का भी पूरा आदर व सम्मान करते हैं जिसके अनुसार किसी मामले का निर्दोष प्रकाशन, न्यायिक कृत्यों की निष्पक्ष और उचित आलोचना तथा न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष पर टिप्पणी करना न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है । 

Image and Copyright :- #BhartenduVimalDubey 

Published - 27 अगस्त 2020 
Edited - 4 नवंबर 2020

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